Top 21 + Hindi Short Stories For Kids / हिंदी की बेहद रोचक 21+ कहानियां

0 Comments
Hindi Short Stories

Hindi Short Stories इस पोस्ट में  Short Story in Hindi की Short Moral Stories in Hindi की कहानियां दी गयी हैं।  मुझे उम्मीद है कि सभी Small Story For Kids in Hindi आपको जरूर पसंद आएँगी। 

 

 

 

 

Hindi Short Stories With Moral And Pictures

 

 

 

 

Best Hindi Stories hide

 

 

1- भवानी पुर राज्य के राजा जितेन्द्र सिंह बड़े ही नेक दिल के इंसान थे, जैसा की उनका नाम था उसी अनुरूप राजा थे भी उन्होंने अपने नाम जितेंद्र  को सार्थक कर दिया था।

 

 

 

उन्हें जीवन में किसी वस्तु का अभाव तो था नहीं, उसके साथ ही उन्होंने अपनी सभी इच्छाओ को अपने वस में कर लिया था।  सदाचारी रहते हुए उन्होंने हर काम प्रजा की भलाई के लिए किया।  उनके राज्य में एक बहुत बड़ी साप्ताहिक बाजार लगती थी, जिसमे सभी जीवनोपयोगी वस्तुओ की बिक्री होती थी।

 

 

 

 

राजा का यह नियम था कि  बाजार खत्म होने पर जिसका जो भी सामान नहीं बिका रहता उसे राजा खुद भेष बदलकर बाजार से खरीद लेते थे, ताकि उस आदमी की जीविका भी चलती रहे। साप्ताहिक बाजार लगा हुआ बाजार में पूरी रौनक थी खरीदारी भी अपने पुरे सबाब  पर थी।

 

 

 

लेकिन एक बढ़ई बहुत ही उदास बैठा था, कारण उसने एक चन्दन का पलंग बना कर लाया था। वह अभी तक बिका भी नहीं था जबकि आधे घंटे बाद बाजार बंद हो जाता।

 

 

 

Hindi Short Stories For Class 9

 

 

 

 

नहीं बिकने का कारण यह था कि पलंग की कीमत बहुत ज्यादा थी जो आम आदमी के बस में नहीं थी। इसलिए ग्राहक पलंग की कलात्मकता देखकर आते थे , लेकिन कीमत सुनकर निराश होकर चले जाते थे।

 

 

 

 

पलंग की कीमत चार सौ स्वर्ण मुद्रा थी , जो उसके कलाकारी और गुण के हिसाब से बहुत ही कम थी। बढ़ई भी उदास होकर भगवान को याद कर रहा था और उस घडी को मन ही मन कोस रहा था। जब उसे ऐसा पलंग बनाने का विचार आया था।

 

 

 

बढ़ई अभी सोच ही रहा था तभी  नियम के अनुसार राजा भेष बदलकर आए और बढ़ई से पूछे “काका यह पलंग कितने का है। “आवाज सुनकर बढ़ई की तन्द्रा टूटी तो देखा पूरा बाजार खाली  हो चुका था।

 

 

 

 

वहां  सिर्फ तीन लोग थे। बाकी सब व्यापारी और जनता जा चुकी थी। यह पलंग चार सौ स्वर्ण मुद्रा का है। ” किस लकड़ी का बना है और क्या खासियत है? ” भेष बदलने वाले राजा जितेंद्र ने बढ़ई से पूछा।

 

 

 

 

” यह पलंग चन्दन की लकड़ी का बना हुआ है और इसकी खासियत जब आप इस पर सोयेंगे तभी पता चलेगा ” बढ़ई ने कहा। राजा ने बढ़ई को चार सौ स्वर्ण मुद्राएं दे दी और अपने साथ आये हुए सेवक के हाथो पलंग को उठवा ले गए। रात जब हुई तो राजा उस पलंग पर सोने चले गए।

 

 

 

जब रात को बारह बजे, तब उसमे से एक पाया तीनो से बोला, ” आप लोग एक घंटे के लिए हमारे हिस्से का बोझ संभालें।  मै एक घंटे में नगर का भ्रमण कर के आता हूँ।  याद रखना राजा को तकलीफ नहीं होनी चाहिए। ” मनुष्यों  की तरह बातें सुनकर राजा की नीद उचट गई और उन्होंने उन चारो की बाते सुनी और चुप चाप पलंग पर पड़े रहे।

 

 

 

एक घंटे बाद पाया वापस आया और सहयोग के लिए उसने तीनो साथियो को धन्यवाद कहा और अपने स्थान पर खड़ा हो गया। “आपने नगर भ्रमण किया तो उसका पूरा वृतांत हम लोगो से कह सुनाओ। ” सभी पायो ने एक स्वर में कहा।

 

 

 

नगर भ्रमण के दौरान मैंने इस राज्य के मंत्री को सीमा पार वाले राजा के मंत्री से मिलते हुए देखा। कल सुबह दस बजे दूसरे राज्य का राजा इस राज्य पर चढ़ाई करने वाला है और यहाँ का भेद जयचंद नाम का मंत्री उस राज्य के मंत्री को बता दिया है। इतना कहकर वह पाया चुप हो गया। पूरी बात सुनकर राजा की नीद उड गयी।

 

 

 

उन्होंने रात  में ही अपने वफादार मंत्री सुखबीर को बुलाकर पूरी बात बताते हुए पूछा, ” अब क्या करना चाहिए ? ” सुखबीर को ‘ काटो तो खून नहीं ‘ .

 

 

 

 

इसे भी पढ़ें  Short Moral Stories in Hindi For Class 7 / भरोसा करिये यह हैंडपैंप चलता है

 

 

 

 

उसने कहा, ”  महाराज जयचंद को तुरंत गिरफ्तार करवाइए और पूरी फ़ौज को पूरी तैयारी के साथ छुपाते हुए सीमा  पर लगवाइए। इस तरह दुश्मन हमारे राज्य की तरफ आएगा तो उसे सपने में भी गुमान नहीं होगा कि यहाँ सब तैयारी है और दुश्मन मुँह की खायेगा । “

 

 

 

 

राजा ने फ़ौरन नगर कोतवाल सुमेर को आदेश दिया कि तुरंत ही जयचंद को पकड़कर कारागार में डाल दो।  सुमेर ने तुरंत ही आज्ञा का पालन करते हुए जयचंद को कारागार में डाल दिया।

 

 

 

महामंत्री ने प्रधान सेनापति को पूरी बात बताते हुए तुरंत ही तैयारी का आदेश दिया भवानी पुर की सारी सेना बगल वाले राज्य की सेना के स्वागत के लिए तैयार हो चुकी थी।

 

 

 

 

सीमा पार का राजा जो एक नम्बर का दुष्ट था उसने अपने सैनिको को सुबह आठ बजे ही चढ़ाई करने का आदेश दिया, लेकिन भवानी पुर में तो बगल वाले राजा के स्वागत की तैयारी तो रात से ही चल रही थी। दोनों सेनाओ में जमकर लड़ाई हुई भवानी पुर के राजा की विजय हुई और दूसरा राज्य भी राजा जीतेन्द्र के राज्य में मिला लिया गया।

 

 

 

 

आज दूसरी रात थी बारह बज रहे थे।  राजा के आखो से नीद कोसो दूर थी कारण कि आज दूसरा पाया नगर में घूमने वाला था।  तीनो पायो ने पूरा बोझ संभाला और दूसरा चला गया।

 

 

 

 

नगर घूमने के दौरान दूसरे पाए ने देखा कि एक  बुढ़िया बहुत ही करुण बिलाप कर रही है। उसका कारण यह था कि उसकी लड़की कि शादी कल ही थी और घर में एक पैसा नहीं था। शादी फिर जाएगी और उसके लड़की का ब्याह नहीं हो पायेगा।

 

 

 

 

 

एक घंटे में वह पाया भी घूमकर आया और सारी बाते अपने तीनो साथियो को बता दी। सुबह होते ही राजा ने महामंत्री को पूरी बात बता कर उस बुढ़िया का पता लगाने को कहा और पूरी मदद देकर उसके कन्या की शादी करवाने के लिए कहा। इस दो बातो को जानकर महामंत्री बहुत ही आश्चर्य में पड़ गया, लेकिन राजाज्ञा का पालन करना था। चारो तरफ राजा की जय – जय कार हो रही थी।

 

 

 

 

आज तीसरा दिन था।  राजा तो मानो इसीलिए जाग रहा था कि आज क्या होगा ? उसका पता कैसे चलेगा ? तीसरा पाया अपने साथियो पर भरोसा कर नगर भ्रमण के लिए चला गया। एक घंटे के बाद जब वह वापस आया तो तो सबने उससे पूछा क्या खबर लाए हो ? तो उसने कहा आज मैं तीन खबर लाया हूँ।

 

 

 

पहला  राज्य के पश्चिम हिस्से में कल सुबह दंगा होने वाला है। उत्तरी हिस्से में एक आदमी को मारने की तैयारी चल रही है, जो की बेकसूर है। तीसरी खबर इस राज्य के लाला की बहू अपने शौहर से गद्दारी करके उसे जेल भिजवाने की तैयारी में है। वह कैसे जरा बिस्तार से बताओ – तीनो पायो ने कहा।

 

 

 

 

 

लाला का लड़का आज ही कमाकर आया है। लड़के के नहीं रहने के कारण लाला की बहु बदचलन हो गई थी।  लाला का लड़का जब परदेस से आया तो उसकी खिदमत करने के बाद रात बारह बजे अपने आशिक से मिलने गई।

 

 

 

इसे भी पढ़ें  Moral Stories in Hindi For Class 9 Pdf / सच्चा विश्वास हिंदी कहानी

 

 

 

 

देर होने के कारण उसका आशिक गुस्सा होकर उसकी  नाक काट लिया। घर आने पर उसने इसका दोष अपने शौहर पर लगा दिया जब कि शौहर बेकसूर था  और उसका आशिक उसके घर के पीछे अभी भी छुपा बैठा है। उसके बाद उन पायों का वार्तालाप बंद हो गया। राजा ने मंत्री को बुला कर तीनो बात बताई और तीनो बातो का निराकरण करने के लिए कहा।

 

 

 

आज चौथा दिन था -और नंबर चौथे पाए का उसने तीनो के ऊपर भरोसा करके नगर घूमने चला।  रास्ते में उसे एक नाग मिला। पाए ने पूछा, ”  कहा जा रहे हो ? ”

 

 

 

नाग ने कहा, ”  मै इस नगर के राजा को काटने जा रहा हूँ। आज सुबह चार बजे राजा की मौत हो जाएगी। मै उनके जूते में छुपकर बैठुंगा और जूता पहनते ही काट लूंगा।  पाया तुरंत ही लौट आया और उसे समय से पहले आया देखकर सभी चौक पड़े , लेकिन उसने जो बात बताई तो सब दुखी हो गए।

 

 

 

राजा भी चौकन्ने होकर सब बाते सुन रहे थे। तीन बजे ही राजा ने द्वारपाल को बुला कर अपने जूते में नाग छुपे होने की बात बताई तो द्वारपाल आश्चर्य व्यक्त करने लगा, लेकिन राजाज्ञा का पालन करना था, सो उसने जोर से जूते को पलटकर लाठी से उस नाग मार दिया।

 

 

 

उस पलंग की कीमत चार सौ स्वर्ण मुद्रा बहुत ही कम लगी।  उस पलंग की वजह से कोई भी घटना राजा को समय से पहले ही पता लग जाती और उसका निवारण हो जाता।

 

 

 

 

राजा ने राज्य के उस बढ़ई की खोज करवाई और उसे आजीवन राजकोष से भरण पोषण का आदेश दिया। मित्रों यह Hindi Short Stories आपको जरूर पसंद आयी होगी, इसे आप शेयर भी जरूर करें।

 

 

 

 

हिंदी कहानी दंगल ( Hindi Short Story )

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

2-  Hindi Short Moral  Stories –  हरिनाथपुर गांव से पांच किलोमीटर दूर बहादुरपुर गांव में हर साल नाग पंचमी के दिन दंगल लगता था और आज नागपंचमी का दिन था तो सोहन ने अपने मित्र पंकज से कहा, ” पंकज आज नाग पंचमी है।  दंगल देखने चलोगे ? बहुत बड़ा दंगल लगता है। “

 

 

 

 

सोहन ने पंकज से कहा, ” जाना तो है, लेकिन तुम अपने साथ छोटू और राहुल को भी साथ ले चलो। क्योंकि वह दोनों कुश्ती के दांव पेंच में उस्ताद है। ”

 

 

 

 

इसपर  सोहन ने कहा, ”  मैंने उन दोनों को पहले ही कह दिया है क्योंकि बहादुरपुर के दंगल में बहुत दूर दूर से पहलवान आते है और वहां कुश्ती के शौकीनों का बहुत बड़ा जमावड़ा होता है। लिहाजा पुरस्कारों की बरसात होती है और सुरक्षा का भी पूरा ध्यान दिया जाता है, क्योंकि वहां पर कुश्ती लड़वाने की जिम्मेदारी भूतपूर्व पहलवानो की रहती है। वहां सबको अपना अपना दांव पेंच दिखाने का पर्याप्त अवसर भी मिलता है और वहां पर किसी की भी दबंगई नहीं चलती अर्थात झगड़ा नहीं होता है। ”

 

 

 

 

यह सुनकर पंकज ने सोहन से कहा, ”  ठीक है तब तो हम अवश्य ही दंगल देखने चलेंगे। ”

 

 

 

 

बहादुरपुर का दंगल बहुत ही प्रसिद्ध था। वहाँ दूर दूर से नामी पहलवान आए हुए थे। आज इस दंगल की रजत जयंती वर्ष था। इसलिए इस वर्ष दंगल की राशि  हर वर्ष की अपेक्षा बहुत ज्यादा रखी गई थी और इस दंगल की खासियत यह थी कि यहाँ कोई भी पहलवान चुनौती देकर वापस नहीं जा पाता  था।

 

 

 

 

 

हरिनाथ पुर गांव से पंकज, सोहन, छोटू और राहुल पहलवान के साथ पुजारी चाचा भी आए थे जो एक भी कुश्ती लड़े बगैर ” द्रोणाचार्य ” पुरस्कार के विजेता थे।

 

 

 

 

 

छोटू पहलवान ने कहा, ” हम तो सबसे अंत में लड़ेंगे, अगर कोई चैलेन्ज देगा तब। ”

 

 

 

छोटू की बात सुनकर पुजारी चाचा ने कहा, ” उचित है  तब तक हम राहुल को चार पांच कुश्ती लड़ा देंगे। ”

 

 

 

एक पहलवान को अखाड़े में घुमाया जा रहा था पांच हजार का दांव लगा था। बोली चालू थी……छः हजार कोई नहीं आया, सात हजार अब भी कोई नहीं आया, फिर नौ हजार का इनाम रखा गया।

 

 

 

 

 

नौ हजार का इनाम सुनकर पुजारी चाचा ने कहा, ” राहुल जाओ अखाड़े में। ” इसपर राहुल ने कहा, ” नहीं एक हजार और बढ़ने दो। ”

 

 

 

 

बोली जारी रही……दस हजार, दस हजार एक, यह सुनकर राहुल दौड़ते हुए अखाड़े में गया और पान का बीड़ा उठाकर दूसरे पहलवान से हाथ मिलाया। वह दस हजारी पहलवान राहुल को विस्मय  से देखता ही रह गया। निश्चित समय पर कुश्ती आरम्भ हुई।

 

 

 

 

 

पंद्रह मिनट बीतने के बाद कोई परिणाम नहीं निकला तो निर्णायक का स्वर गूंजा, ”  यह कुश्ती अनिर्णीत है। ” इसपर राहुल ने निर्णायक से कहा, ”  सिर्फ दो मिनट दे दीजिए।”

 

 

 

 

जबकि दूसरा पहलवान पस्त हो चुका था। राहुल की बात सुनकर निर्णायक ने कहा ठीक है, दो मिनट से ज्यादा नहीं।

 

 

 

 

पुजारी चाचा ने अपने दोनों हाथों को हवा में लहराते हुए ताली बजाई। राहुल ने उनकी ओर देखा और उनका इसरा समझ गया। दर्शक कुछ समझ पाते राहुल ने सेकेंड से भी कम समय में उस पहलवान को जमीन पर पटक दिया। उसके बाद राहुल के ऊपर दर्शकों के पुरस्कार की बरसात होने लगी।

 

 

 

 

समय के साथ साथ राहुल ने ऐसे ही तीन कुश्तियों का फैसला किया। समय बीतता जा रहा था, अब बारी थी गुरुदासपुर के पहलवानों की हर वर्ष की तरह इस बार भी गुरुदासपुर के पहलवानों का दबदबा था। लेकिन इस बार वहां के पहलवानों ने अति उत्साह में आकर चैलेन्ज कर दिया था।

 

 

 

 

 

दांव लगा था छोटेलाल  पहलवान पर, इनाम पचास हजार तक पहुँच चुका था। यहां दृश्य ” तजहु आस निज – निज गृह जाहू ” हो चुका था, लेकिन विश्वामित्र गुरु पुजारी चाचा ने छोटू पहलवान रूपी राम को चैलेन्ज रूपी शिवधनुष को तोड़कर इनाम रूपी सीता का वरण कर आयोजक रूपी जनक का परिताप मिटाने की आज्ञा दी।

 

 

 

 

 

छोटू उस्ताद को ऐसे ही मौके का इंतजार था। वह उछल कर अखाड़े में आया और पान का बीड़ा उठाते हुए छोटेलाल से हाथ मिला लिया। यह दृश्य देखकर जनता के बीच सन्नाटा पसर गया। कारण छोटू का डील डौल ही कुछ वैसा था।

 

 

 

 

 

निश्चित समय से पहले ही छोटू पहलवान अखाड़े में पहुंचकर दंड बैठक करने लगा। प्रत्येक बैठक के बाद छोटू का शरीर लोहे के राड जैसा मजबूत होता गया। कुश्ती शुरू हो चुकी थी लड़ते हुए साढ़े चार बज चुके एक से एक दांव पेंच का दोनों तरफ से प्रदर्शन हो रहा था। छोटे लाल का प्रयास था कि कुश्ती अनिर्णीत होनी चाहिए कारण कि छोटू की कलाबाजी को देखकर उसे आभास हो गया था कि छोटू से पार पाना मुश्किल है। लेकिन छोटू सोच रहा था कि वह कुश्ती ही क्या जिसका कोई फैसला नहीं।

 

 

 

 

दर्शको ने भी ऐसी कुश्ती पचास साल में आज ही देखी थी। निर्णायक का स्वर, ” पांच बजने में पांच मिनट शेष है।”

 

 

 

 

गजब हो गया को ”  दंड खंडे उराम “ तुलसी वाली कहावत चरितार्थ हो गई,  अर्थात छोटेलाल धरती माता की गोंद में तारों की गणना कर रहे थे । जनता ने छोटे बादशाह को कन्धों पर उठा लिया फूलों के साथ नोटों की भी बरसात हो रही थी। यह दृश्य देखकर सब लोग छोटू पहलवान और हरिनाथ बाबा की जय बोलने लगे।

 

 

 

 

तीन पंखे का रहस्य ( Moral Stories in Hindi  )  

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

3- मित्रों हमें अपने कर्तव्यों के साथ ही उस शक्ति का भी ध्यान रखना चाहिए, जिसने इस संसार को बनाया है।  इससे हमें ना सिर्फ मानसिक शान्ति मिलती है बल्कि जीवन में परेशानियों से लड़ने की उम्मीद भी बढती है।  आज की यह Short Stories इसी पर आधारित है।

 

 

 

 

हेड मास्टर आदेश श्रीवास्तव तीन Table Fans की तरफ इशारा करते हुए, सभी बच्चों से इन पंखों की गति का आकलन करने के उपरांत, उनकी Explanation के बारे में बच्चों से जानना चाहा।

 

 

 

 

उन्होंने विनोद से कहा कि, ” तीनो पंखों को चालू कर दो।” तीनो पंखे चालू हो गए। पहले वाले पंखे की गति कम  थी, दूसरे की गति मध्यम थी और तीसरे पंखे की गति तीव्रतम थी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दे ?

 

 

 

 

क्लास में सन्नाटा छा गया था। शिवम ने हाथ उठाया, हेडमास्टर को लगा कि वह उत्तर देना चाहता है। हेड मास्टर ने उत्तर देने की सहमति दे दी। शिवम ने उत्तर देते हुए कहा, “सर, जो तीसरा पंखा है। वह आज की तीव्रगामी Life का प्रतीक है, क्योकि आज के समय में किसी के पास समय नहीं है।  सब भागे जा रहे है। ”

 

 

 

 

उसके बाद शिवम बोला, ” मध्यम गति का पंखा याद दिलाता है भागम भाग की जिंदगी में थोड़ा समय अपने समाज और देश को देना चाहिये और पहला कम गति वाला पंखा इस बात की याद दिलाता है कि हमें इस भाग – दौड़ की जिंदगी में से अपने देश और समाज के प्रति कर्तव्य के साथ – साथ थोड़ा सा ही कुछ समय निकाल कर उसकी याद करनी चाहिए जिसने हमें इस दुनिया में भेजा है।”

 

 

 

 

 

Moral  – कितना भी व्यस्त रहने पर भी अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के साथ – साथ हमें God का भी स्मरण करना चाहिए, जिसने यह अनमोल जीवन दिया है।

 

 

 

 

 

                  ( Hindi Short Stories For Kids ) 

 

 

 

 

4-एक महात्मा एक नगर से होकर जा रहे थे तभी उन्हें रास्ते में एक सोने का सिक्का मिला।  महात्मा जी तो ठहरे बैरागी और संतोष से भरे व्यक्ति इसलिए उन्होंने सोचा कि मुझे इससे क्या मतलब इसे  किसी गरीब को दे दिया जाए।

 

 

 

वे पूरे रास्ते देखते गए कि कोई गरीब तो मिले लेकिन उन्हें कोई गरीब नहीं मिला।  एक दिन वे अपने नित्यकर्म के लिए सुबह उठते हैं तो देखते हैं कि एक राजा अपनी सेना को लेकर दूसरे राज्य पर आक्रमण के लिए जा रहा था।

 

 

 

राजा ने सोचा यहां ऋषि की  कुटिया है तो उसने सोचा क्यों नहीं ऋषि से आशीर्वाद ले लिया जाए ताकि विजय निश्चित हो। इसपर वह राजा कुटी में आया और ऋषि को प्रणाम करके उसने बोला, ”  महात्मा जी मैं एक राज्य  पर आक्रमण करने जा रहा हूँ।  आप मुझे आशीष दें कि मैं उस युद्ध में विजय अवश्य पाऊं।  “

 

 

 

तब ऋषि  ने पूछा, ” अच्छा यह बताओ क्या उस राज्य से तुम्हारी कोई दुश्मनी है ? क्या उसने तुम्हारा कुछ बिगाड़ा है ?” तब राजा ने कहा, ” नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। ”

 

 

 

इस पर ऋषि बोले, ” फिर तुम हमला करने के लिए क्यों जा रहे हो ? ”  तब राजा बोला, ” मैं अपने राज्य की सीमाएं बढ़ाना चाहता हूं और इसीलिए उस पर हमला करने के लिए जा रहा हूं।  ”

 

 

 

ऋषि ने कुछ देर सोचा और उसके बाद राजा के हाथ पर सोने का सिक्का रख दिया। इस पर राजा ने कहा, ” यह क्या है ? ” इस पर ऋषि ने कहा, ” यह सिक्का मुझे एक दिन नगर भ्रमण के दौरान मिला था।  मैंने सोचा यह सोने का सिक्का मेरे किस काम का है।  मैंने सोचा इसे किसी जरूरमंद को दे दूंगा और तुम्हें देखकर मुझे लगा कि तुम से ज्यादा गरीब और जरूरतमंद कोई नहीं है और इसीलिए मैंने यह सिक्का तुम्हें दे दिया।  ”

 

 

 

ऋषि की बात सुनते ही राजा को अपनी गलती का एहसास हो गया और उसने ऋषि से क्षमा मांगी और उसने युद्ध का विचार त्याग दिया और अपने राज्य वापस लौट गया और अपनी प्रजा की सेवा करने लगा।

 

 

 

Hindi Short Stories With Moral For Hindi Students

 

 

 

 

5- मित्रों सिर्फ काम ही करो, हर वक्त काम करो यह ठीक नहीं है।  आप काम करो और उसका लाभ भी लो।  आज की यह कहानी इसी पर आधारित है। 

 

 

 

मेरे Father बहुत ही Hardworking थे। मुसीबत के समय उन्होंने हमें संभालने के लिए बहुत hard work किया।  दिनभर काम करने के बाद शाम को Classes में भाग लिया।

जिससे उन्हें काम की अच्छी Information हो जाए और अच्छे payment वाली job मिल सके। मुझे बेहतर याद है कि Sunday को छोड़कर शायद ही उन्होंने हमारे साथ भोजन किया हो।
उन्होंने बहुत मेहनत की और पढ़ाई की, क्योंकि वह अपने परिवार को एक खुशहाल जीवन देना चाहते थे। जब भी परिवार ने शिकायत की कि वह उनके साथ पर्याप्त समय नहीं बिता रहें हैं।
इसपर उनका एक ही जवाब रहता, ” यह सब family के लिए ही तो कर रहा है  . ” परन्तु  reality यह थी कि वह भी family के साथ रहना चाहते थे।
Exam के Result का दिन आ गया. उनकी Hard Work रंग लायी। उन्होंने बहुत ही अच्छे Numbers से परीक्षा पास की। उन्हें वरिष्ठ पर्यवेक्षक की नौकरी मिली और एक अच्छी Payment भी।
यह उनके लिए Dreams के सच होने जैसा था।  अब वे Family को  Good life दे सकते थे। जिसके लिए उन्होंने Hard Work  की थी। हालाकि अभी परिवार को उनके साथ समय बिताने का ज्यादा Time नहीं मिल पा रहा था।
क्योंकि अब वे .. प्रबंधक के पद पर Promote होने की उम्मीद करते हुए Hard Work कर रहे थे। उन्होंने खुद को पदोन्नति के लिए योग्य उम्मीदवार बनाने के लिए  University में एक और पाठ्यक्रम के लिए दाखिला लिया।
इस बार भी उनकी Hard Work रंग लायी और उन्हें प्रमोशन मिल गया।  उन्होंने मां को घरेलु कार्यों से मुक्त करने के लिए एक नौकरानी रखने का फैसला लिया और उन्होंने 3 BHK का एक बड़ा घर भी खरीदा। अब Life और भी बढ़िया और सुविधाजनक हो गयी थी.
लेकिन उन्होंने इसे और आगे बढाने का फैसला लिया और भी अधिक  Promotion के लिए उन्होंने और भी Hard Work शुरू कर दी। मां के यह कहने पर की ” हमारे साथ भी Time Spend किया करो ” उनका वही डायलाग रहता कि यह सब तुम सभी लोगों के लिए ही तो कर रहा हूँ.
उन्होंने इसके लिए फिर से Hard Work  शुरू की और उन्हें Success मिली। इस बार उन्होंने एक बहुत ही बड़ा घर लिया और एक Car भी ली. अब उन्होंने यह निश्चित किया कि अब वे परिवार के साथ ही समय बितायेंगे। अब और मेहनत नहीं करेंगे।
उनके इस फैसले से हम very happy थे, लेकिन जल्द ही हमारी ख़ुशी ख़त्म हो गयी।  Dad की तबियत बहुत खराब हो गयी और उन्होंने Hospital पहुंचाया गया और वहाँ उनकी Death हो गयी।

डाक्टर ने बताया कि बहुत Hard Work  की वजह से उन्हें काफी Weakness हो गयी थी। अब हमें यह समझ आ रहा था कि आखिर वे ऐसा क्यों कहते थे कि ” यह सब तुम्हारे लिए ही तो कर रहा हूँ ” .  इस कहानी से यही सीख मिलती है कि पैसा कमाना बहुत ही अच्छी बात है।  हर कोई पैसा कमाना चाहता है, लेकिन अपनी सेहत का ध्यान देना भी बहुत आवश्यक है। 

Small Story in Hindi ( कबीर जी की सलाह ) 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

6-संत कबीर रोज सत्संग करते थे. उसमें बहुत सारे भक्त आते थे और उसको अमल करके अपने जीवन को Success बनाते थे. एक दिन की बात है रोज की तरह ही संत कबीर प्रवचन दे रहे थे.

सत्संग के खत्म होने पर सभी भक्त गण अपने अपने घरों की ओर चल दिए, लेकिन एक व्यक्ति वहीँ बैठा रहा. जब कबीर ने उससे पूछा कि क्या हुआ, क्यों परेशान हो… सभी लोग चले गए लेकिन तुम क्यों नहीं गए…किस बात की परेशानी है?
 तब उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे आपसे कुछ पूछना है. मैं एक गृहस्थ हूँ. घर में हमेशा ही आपस मे झगडा होता रहता है जिससे घर का माहौल हमेशा ही ख़राब रहता है. मैं आपसे इसका हल जानना चाहता हूँ कि कैसे इसे सुलझाया जा सके.
कबीर जी कुछ समय तक शांत रहे. फिर उसके बाद अपनी पत्नी को कहा की लालटेन जलाकर लाओ. इस पर कबीर की पत्नी ने लालटेन जलाकर ले आयीं. इस पर वह आदमी एकदम से हैरान रह गया की इस भरी दोपहरी में कबीर जी ने लालटेन क्यों मंगवाई ?
इसके बाद संत कबीर ने अपनी पत्नी से कहा कि कुछ मीठा लेकर आओ. इसपर उनकी पत्नी ने मीठे की जगह नमकीन लाकर दे दिया . इस पर उस आदमी ने मन ही मन कहा कि कैसे लोग हैं मीठे के बदले नमकीन और दिन में यहाँ तक की भरी दोपहर में लालटेन.
इस पर उस आदमी ने खीझकर कहा कि यह सब क्या है. मैं तो अपनी समस्या के समाधान के लिए यहाँ आया था और आपने यह सब दिखा दिया . इससे तो मैं और भी परेशान हो गया.
इस पर संत कबीर मुस्कुराए और कहा कैसे ही मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी पत्नी कह सकती थी की तुम्हें हो क्या गया है भरी दोपहरी में लालटेन मगवां रहे हो, लेकिन उसने कुछ नहीं.
चुपचाप लालटेन लाकर रख दी. उसी तरह जब मैंने मीठा मंगवाया तो उसने नमकीन ला दी तो मैं यह सोचकर चुप रहा कि हो सकता है घर में कोई मीठा ना हो.
अब वह व्यक्ति सबकुछ समझ गया. कबीर ने कहा गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है. आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और जब औरत से गलती हो तो आदमी संभाल ले. यही गृहस्थी का मूल मन्त्र है.

Hindi Story For Children ( दो मूर्खों की लड़ाई ) 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

 

7-  ज्येष्ठ मास की तपती हुई दुपहरी में राघव सायकल से अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रहा था। गर्मी से बेहाल होकर वह एक वृक्ष के निचे ठहर गया।  उसे थोड़ी राहत महसूस हुई और उसे नींद आ गई और वह स्वप्न में खो गया।

उसने स्वप्न में हाथियों का एक झुण्ड देखा जो आपस में जलक्रीड़ा कर रहे थे। उसमे एक हाथी बहुत विशाल था जो उन लोगों सरदार था। उसे अपने बल पर बहुत घमंड था।
जल क्रीड़ा के उपरांत सभी हाथी एक साथ बाहर निकले और हाथियों का सरदार सबसे पीछे बाहर निकला, और उन्मुक्त चाल से उन हाथियों के पीछे चल दिया।
कुछ दूर जाने के बाद उसे रास्ते में दो लंगूर आपस में लड़ते हुए दिखे।  हाथियों के सरदार ने उनसे पूछा, ” आप लोग आपस में क्यों लड़ रहे हो ? ?
एक लंगूर ने जवाब दिया, ” इसने हमारी आम से भरी टोकरी छीन ली है। “
यह सुनकर हाथी ने कहा, ” अगर यही बात है तो मैं तुम्हे आमों से भरी  हुई दूसरी टोकरी दूंगा।तुम लोग आपस में लड़ना बंद करो। “
” तुम कौन होते हो हमें उपदेस देने वाले ? हम लोग अपना फैसला स्वयं कर लेंगे।” यह कहकर  दोनों लंगूरों ने उस हाथी के उपर ही हमला कर दिया। कोई इधर से मारता तो उधर से।  हाथी किसी तरह वहां से जान बचाकर भागा। मुझे उम्मीद है कि आप यह Hindi Short Stories जरूर पसंद किये होंगे।
Moral – दो मूर्खों की लड़ाई में कभी नहीं उलझना चाहिए, अन्यथा हाल हाथी जैसा हो सकता है। 
Moral Of The Story – Two fools should never get into a fight.

Short Stories With Moral Values in Hindi अधूरा कार्य ना छोड़े 

8- रामू पढ़ने में बहुत होशियार था, लेकिन वह अपनी कक्षा में प्रथम स्थान नहीं प्राप्त कर पाता था। परीक्षा नजदीक आ गई थी।  रामू उदास था। उसे उदास देखकर उसकी माँ ने उसका कारण पूछा, तो रामू ने अपनी माँ को सब बातें बता दी कि कैसे स्कूल में सभी लड़के उसके मजाक उड़ाते है। रामू की माँ ने कहा, ” इसमें Sad होने की क्या बात है ? तुम अपने अंदर थोड़ा सुधार करो अर्थात किसी भी विषय को पूर्ण रूप से पूरा करने के बाद ही दूसरे Subject के लिए प्रयास करो। “
रामू ने अपनी माँ की आज्ञा को शिरोधार्य कर पढाई शुरू कर दी। परिणाम उसके सामने था। वह अपने कक्षा में बहुत ही अच्छे नंबर के साथ प्रथम आया।
Moral – किसी भी कार्य को बीच में अधूरा छोड़ देने से असफलता ही हासिल होती है। इसिलिये किसी भी कार्य को अधूरा ना छोड़े। 

बुधिया काकी हिंदी कहानी 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

9-  किसी  को क्या पता था कि बुधिया काकी का जीवन वृद्धावस्था में भी स्वर्ण के समान ही शुद्ध और चमकदार बन जाएगा और लोगो के लिए एक प्रेरणा भी। इसलिए इंसान को किसी की आशा न करते हुए अच्छे कार्य की शरुवात खुद ही करनी चाहिए। अगर मंजिल तक पहुंचना है तो पहला कदम खुद ही बढ़ाना पड़ेगा उसके बाद तो कारवां बनते देर नहीं लगेगी।

 

 

 

 

 

 

बुधिया काकी एकदम अकेली थी। कोई सहारा नहीं था उनका लेकिन उनके अंदर प्रकृति के लिए सदैव प्रेम रहता था। वह घटते वृक्षों की संख्या पर ही व्यथित होती थी।

 

 

 

 

कही कोई वृक्ष काटा जाता तो वहां पहुंचकर सबको समझाती थी कि वृक्ष नहीं रहने से कितना नुकसान होता है। लेकिन कोई उसकी बात को गंभीरता से नहीं लेता था।

 

 

 

 

अब बुधिया काकी ने एक नायाब तरीका निकाला था। जहां कोई भी पेड़ काटा जाता था उसके ठीक दूसरे दिन ही बुधिया काकी दूसरा पेड़ लगा देती थी और तब तक उसकी देखभाल करती थी जब तक वह पेड़ बड़ा नहीं हो जाता था।

 

 

 

 

इसके लिए कई लोगो ने उसे कटुवचन भी कहे, किसी ने उलाहना भी दिया। लेकिन बुधिया काकी मानो गूंगी और बहरी हो गई थी। उसे सिर्फ और सिर्फ एक ही कार्य था अपने द्वारा लगाए गए पौधों की देखभाल करना।

 

 

 

 

 

यहां तक कि पौधा लगाने का इतना जूनून था कि उसे खाने तक का ध्यान नहीं रहता था। उसे कोई कुछ देता था तो खा लेती अन्यथा ऐसे ही सो जाती। फिर सुबह किसी के घर के सामने खुद लगाए हुए पौधे को पानी देती थी।

 

 

 

 

फिर सड़क के किनारे पौधों की परवरिश करती या फिर किसी पोखरे के टीले पर पौधे लगाने का कार्य करती थी। दिन महीने साल बीतते गए अब बुधिया काकी के लगाए हुए पौधे बड़े होने लगे थे।

 

 

 

 

 

अब सभी को उसके कार्य का महत्व समझ आने लगा था। सड़क के किनारे को पथिक गर्मी के दिनों में पेड़ के नीचे आराम करता हुआ नजर आता तब बुधिया काकी को बहुत ही ख़ुशी और संतोष प्राप्त होता था। एक बार जिले के D. M. बिनीत कुमार अपने दौरे पर गए हुए थे।

 

 

 

 

सड़क के किनारे लगे हुए वृक्ष और पोखरे के टीले पर लगे वृक्षों की हरियाली ने D. M. बिनीत कुमार को सोचने पर विवश कर दिया इस स्वार्थी युग में ऐसा कौन सा ध्रुव पैदा हुआ है जो अपने दृढ इरादे के साथ ही समाज और पर्यावरण की सुरक्षा कर रहा है।

 

 

 

 

 

उन्होंने पता लगवाया तो जो बात सामने आई उसे सुनकर उन्हें बहुत ही आश्चर्य हुआ और ख़ुशी भी हुई कि ऐसी निःस्वार्थ लोग अभी भी इस दुनिया में है जो प्रकृति से सदैव प्रेम करते है।

 

 

 

 

 

 

D. M. ने बुधिया काकी को सम्मानित करने का निश्चय किया। वह खुद ही काकी के घर पहुंचे और प्रणाम किया पूछा कि आपको प्रेरणा कहां से मिली। काकी ने उत्तर दिया इसमें प्रेरणा जैसी बात कहां है यह तो हमारा दायित्व था कि प्रकृति के इस अनमोल उपहार की रक्षा करे।

 

 

 

 

 

हमारी तो बस एक ही लालसा है। कोई भी पेड़ आवश्यकता पड़ने पर ही काटा जाए और उसके एवज में तीन पौधा रोपित किया जाना चाहिए। D. M. काकी से बहुत ही प्रभावित हुए और उसे आजीवन सरकारी मदद दिलाने का भरोसा दिया और समाज गौरव पुरस्कार के लिए एक लाख की नगद राशि भी दिया और काकी के नाम का प्रस्ताव ‘ग्रीन विंडो’ नामक संस्था के पास भेज दिया जो ऐसे लोगो का आजीवन ध्यान रखती थी। बुधिया काकी के कार्य को प्रत्येक लोग अपने जीवन में आदर्श बना सकते है।

 

 

 

Small Stories With Moral in Hindi ज्ञान का महत्व 

 

 

 

Hindi Short Stories

Small Stories With Moral in Hindi

 

 

 

 

10- शिक्षा से ज्ञान आता है या सीखने से अनुभव। अनुभव या ज्ञान दोनों एक सिक्के के दो पहलू है, जिसे ना तो कोई चुरा सकता है ना ही कोई छीन सकता है ना ही कोई देने के लिए बाद्ध कर सकता है। हाँ इसे विनयशील होकर अवश्य प्राप्त कर सकता है लेकिन ज्ञान प्राप्त करने के बाद इसे समाज की भलाई के लिए ही खर्च करना चाहिए, न कि समाज में वैमनस्यता फ़ैलाने के लिए। एक बात और आपका धन दौलत, हीरा मोती सब कुछ खर्च करने पर खत्म हो सकता है लेकिन एक ज्ञान ही तो ऐसा है मनुष्य इसे जितना खर्च करता है उतना ही चक्र वृद्धि व्याज की तरह बढ़ता जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

एक बहुत बड़ा जमींदार था। वह अपने नौकरो के साथ जंगल में सैर करने के लिए गया था। अचानक से मौसम का मिजाज बदल गया। देखते ही देखते काले बादलो का जमघट लग गया और तेज हवाएं चलने लगी। अंधेरा इतना बढ़ गया था कि खुद का हाथ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था।

 

 

 

 

 

जमींदार उस भीषण तूफान में अपने नौकरो से बिछड़ गया था और रास्ता भी भटक गया था। भूख और प्यास से जमींदार का बुरा हाल हो गया था। जब तूफान शांत हुआ तब दिन का थोड़ा-थोड़ा आभास हो रहा था। जमींदार ने इधर उधर देखा शायद कोई दिख जाए तो उससे कुछ सहायता मांगे।

 

 

 

 

 

 

कुछ ही दूर पर उसे तीन बच्चे खेलते हुए नजर आ गए। जमींदार ने उन बच्चो को अपने पास बुलाया और कहा, “बच्चो तुम लोग हमारी सहायता कर सकते हो ?”

 

 

 

 

सभी बच्चे एक साथ बोल पड़े, “कहिए कैसी सहायता चाहते है आप ?”

 

 

 

 

 

जमींदार ने पूरी बात बता दिया और बोला हमारे लिए आज रात को रुकने के साथ ही पानी और भोजन की व्यवस्था चाहिए। सभी बच्चो ने जमींदार को अपने गांव में मुखिया के पास ले जाकर पूरी कथा सुना दी।

 

 

 

 

 

 

मुखिया ने जमींदार के लिए रात भर रुकने के साथ ही भोजन और पानी की आरामदायक व्यवस्था करवा दिया। सुबह हुई तो जमींदार चलने से पहले उन बच्चो से मिलना चाहता था।

 

 

 

 

 

तीनो बच्चे उसके सामने आए तब जमींदार ने एक बच्चे से पूछा, “आपको जिस वस्तु की इच्छा हो मांगो मैं उसे पूरा कर दूंगा मैं तुम लोगो से बहुत खुश हूँ।”

 

 

 

 

पहला लड़का बोला, “हमें ढेर सारे धन और दौलत चाहिए, जिससे मैं भर पेट खाना खा सकूं और आराम से रह सकूं।”

 

 

 

 

 

जमींदार ने अपने नौकर से कहकर उसे ढेर सारा धन दे दिया ( जमींदार के नौकर उसे वहां आ गए थे जहां जमींदार रुका हुआ था ) दूसरे बच्चे से भी जमींदार ने पूछा, “आपको किस वस्तु की आवश्यकता है बताइए वह मैं आपको दूंगा।”

 

 

 

 

 

दूसरा बच्चा बोला, “आप हमें एक घोड़ा गाड़ी और एक बड़ा सा महल दे दीजिए, जिससे मैं अपने महल में आराम से रहकर घोड़ा गाड़ी से अच्छी तरह सैर कर सकूं।”

 

 

 

 

 

जमींदार ने दूसरे बच्चे को महल और घोड़ा गाड़ी दिलवा दिया। फिर तीसरे बच्चे से पूछा, “आपको क्या इच्छा है ?”

 

 

 

 

तीसरे बच्चे ने कहा, “आप हमारी पढ़ाई का प्रबंध करा दीजिए, मैं पढ़ लिखकर अपने देश और समाज की सेवा करना चाहता हूँ।”

 

 

 

 

जमींदार उस बच्चे से बहुत प्रभावित हुआ और उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च स्वयं उठाने के लिए तैयार हो गया। समय का चक्र अपनी निर्वाध गति से घूमता रहा। तीसरा बच्चा पढ़ लिखकर बहुत ही बुद्धिमान बन गया।

 

 

 

 

 

जमींदार ने उसे अपने पास अपना प्रधान व्यवस्थापक नियुक्त कर दिया था। एक दिन अपने प्रधान व्यवस्थापक से पुरानी बातों के विषय में पूछा और बोला, “आपके दोनों दोस्त किस हालत में है। उन्हे हमारे सामने बुलावाओ ताकी मैं उनके विषय में जान सकूं।”

 

 

 

 

 

 

प्रधान व्यवस्थापक के दोनों दोस्त जमींदार के सामने हाजिर हुए। जमींदार ने वर्षो पुरानी बात याद दिलाई तो उनमे से एक बोला, “मैं आपसे क्या बताऊ आपके द्वारा दिया हुआ धन मैं आराम तलब में खर्च कर दिया और आलसी हो गया। कुछ धन चापलूस लोग खा गए कुछ चोरी हो गया, मैं फिर से अपने पहले वाली हालत में आ गया।”

 

 

 

 

 

 

दूसरा बोला, “हमारी भी हालत इससे अच्छी नहीं है। अपने हमें घोड़ा गाड़ी और आलीशान महल दिए थे। मैं हमेशा सैर करता था। घोड़ा कमजोर होकर मर गया। हमारी लापरवाही के कारण महल जर्जर होकर गिर गया। मैं भी अब फटेहाल हो गया हूँ।”

 

 

 

 

 

जमींदार ने कहा, “अपने जो मांगा हमने आपको दिया। इसे देखो आपका यह दोस्त अपने लिए शिक्षा की भिक्षा को मांगा और आज यह उसी शिक्षा के बल पर ही हमारा प्रधान व्यवस्थापक है। लेकिन मैं आप लोगो के द्वारा किया हुआ उपकार नहीं भूला हूँ। आज से आप हमारे यहां रहकर कार्य करेंगे।” जमींदार ने उन दोनों को भी अपने यहां नौकर रख लिया था।

 

 

 

Short Story For Kids in Hindi गुब्बारे की काबिलियत

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

 

 

11- प्रायः सभी की निगाहे गुब्बारा बेचने वाले के ऊपर पड़ ही जाती है। अगर आपके साथ बच्चे हो तो आप न चाहते हुए भी गुब्बारा बच्चे के लिए खरीदने पर विवश तो हो ही जाएंगे क्योंकि बाल हठ ऐसी होती ही है। गुब्बारे वाले के पास कई रंग के गुब्बारे होते है। जो हमारे समाज के अनेक लोगो का प्रतिनिधित्व करते है।

 

 

 

ठीक उसी तरह जिस तरह ईश्वर सभी को एक समान बनाकर ही भेजता है लेकिन यहां आकर अनेक वर्गो में बंट जाते है। उसी तरह गुब्बारे वाला उसमे गैस समान भाव और मात्रा में भरता है, चाहे काला गुब्बारा हो या लाल। मौका मिलने पर शिखर की तरफ छलांग लगाने में नहीं चूकता है।

 

 

 

 

 

 

राजू अपनी माँ-बाप का इकलौता बेटा था लेकिन काले रंग का था। उसके हमजोली बच्चे उसे कालू कहकर बुलाते थे और खूब परेशान करते थे। एक दिन राजू स्कूल गया हुआ था। उसके क्लास में सभी बच्चे उसे कालू कहकर परेशान करते थे।

 

 

 

 

 

सभी बच्चो द्वारा चिढ़ाए जाने के कारण राजू का मनोबल कम हो जाता था। एक दिन क्लास में टीचर ने सभी बच्चो से इतिहास के प्रश्न पूछे,

 

 

 

1. कैलिफोर्निया किस देश का राज्य है। 2. ब्रिटेन की राजधानी कहां है। 3. भारतवर्ष किस महाद्वीप में स्थित है।

 

 

 

 

 

इतना सुनते ही सभी बच्चो की सांसे अटक गई क्योंकि उन्हें स्कूल आने में खेलने का समय मिलता था। पढ़ाई से दूर-दूर तक नाता नहीं था। लेकिन राजू पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठा था।

 

 

 

 

टीचर ने उसका आत्मविश्वास परखते हुए पूछा, “क्या तुम बता सकते हो सारे प्रश्नो के उत्तर ?”

 

 

 

 

राजू के हाँ कहने पर सभी बच्चे उसका मजाक उड़ाने लगे तो राजू नर्वस हो गया। लेकिन टीचर ने उन सभी बच्चो को डांट दिया जो राजू का मजाक उड़ा रहे थे। अब राजू का विश्वास लौट आया था।

 

 

 

 

उसने सभी प्रश्नो का उत्तर देना शुरू किया। 1. कैलिफोर्निया संयुक्त राज्य अमेरिका का एक प्रान्त है। 2. ब्रिटेन की राजधानी लंदन है। 3. भारतवर्ष एशिया महाद्वीप में स्थित है।

 

 

 

 

 

टीचर ने सही उत्तर देने के लिए राजू की प्रशंसा की जबकि सभी बच्चो का चेहरा रंग विहीन हो गया था। लेकिन राजू का हृदय अपने काले रंग को लेकर व्यथित था। वह घर आकर अपनी माँ से बोला, “भगवान ने हमें काला क्यों बना दिया है। सभी हमारा मजाक उड़ाते है।”

 

 

 

 

लेकिन उसके माँ और पिता ने उसे समझाया कि तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दिया करो। लेकिन राजू का बाल मन इन बातों से संतुष्ट नहीं था। राजू नाराज होकर घर से बाहर की तरफ चला गया।

 

 

 

 

सड़क पर एक गुब्बारा वाला काले, पीले, नीले, सफ़ेद कई रंग के गुब्बारे बेच रहा था। राजू उसके पास जाकर खड़ा हो गया। कई सारे बच्चे उसके पास आकर अपनी पसंद के गुब्बारे लेकर चले गए लेकिन राजू उदास खड़ा था।

 

 

 

 

गुब्बारा बेचने वाले ने राजू से उसकी उदासी का कारण पूछा तो राजू बोला, “सभी बच्चे मुझे काला होने के कारण ही मुझे चिढ़ाते है और मेरा मनोबल कम कर देते है।”

 

 

 

 

 

गुब्बारा वाला समझाते हुए बोला, “मैंने सभी गुब्बारों में समान रूप से गैस भरी है तो क्या यह काला गुब्बारा काला होने के कारण ही उड़ेगा नहीं।” उसने काले रंग के गुब्बारे को हवा में छोड़ दिया। गुब्बारे की ‘ऊँची उड़ान’ को राजू देखता ही रह गया।

 

 

 

 

उस दिन से उसने समय न गवाते हुए अपने पढ़ाई पर ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया था। जिसका परिणाम था कि हर बार क्लास में उसे ही ट्राफी मिलती थी। कोई भी उसके पास भी नहीं पहुँच सका था।

 

 

 

Short Moral Stories in Hindi पढ़ाई का मकसद

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

12- पढ़ाई वह नहीं है जो सिर्फ नंबर लाने के मकसद से महत्व की बातों को याद किया जाए। पढ़ाई का असली स्वरूप तो वह है कि कोई व्यक्ति आपसे कही से भी कोई प्रश्न पूछ दे और आप उसका सही उत्तर दे सके। पढ़ाई के साथ ही अन्य विषयो के बारे में जानकारी एकत्रित करनी चाहिए। जिससे सामने वाला आपके उत्तर से संतुष्ट हो सके। तभी आपकी पढ़ाई सार्थक होगी।

 

 

 

 

 

 

बिहारी की दो संतान थी चिंकी और चिंटू। दोनों बच्चे पढ़ने में बहुत ही मेहनत करते थे और अच्छे नंबर के साथ ही फर्स्ट भी आते थे। लेकिन दोनों के पढ़ने का तरीका अलग-अलग था।

 

 

 

 

जहां चिंटू केवल अपने काम की बातों को पढ़ता था वही चिंकी हर बात की जानकारी के साथ ही पढ़ती थी। समय बीतता गया। वार्षिक परीक्षा का समय आ गया। बिहारी ने अपने दोनों बच्चो के सामने घोषणा कर दी थी कि जो पहले नंबर पर आएगा उसे सायकल मिलेगी।

 

 

 

 

दोनों बच्चे खुश थे और पूरे मनोयोग से ही परीक्षा में बैठे थे। लेकिन चिंटू अपने क्लास मे प्रथम आया और चिंकी दूसरे स्थान पर ही रही। वादे के मुताबिक ही चिंटू ने सायकल पर अपना एकतरफा अधिकार जमा लिया था।

 

 

 

 

जबकि उसकी माँ ने कहा सायकल कुछ देर के लिए चिंकी को दे दो लेकिन चिंटू कहां सुनने वाला था। वह सायकल चलाता हुआ भाग गया। बिहारी ने बच्चो के पास होने की ख़ुशी में होटल में खाने का प्रोग्राम बनाया था।

 

 

 

 

 

दोनों बच्चे बहुत ही खुश थे। सभी लोग होटल में खाना खाकर बाहर निकले तो बाहर तीन आदमी खड़े थे। जो बहुत ही मशहूर सायकल कंपनी से आए हुए थे। उन लोगो ने दोनों बच्चो से लिखित प्रश्न हल करने के लिए कहा और पेपर दे दिया।

 

 

 

 

चिंकी जो कि अपने सारे प्रश्न हल करके पेपर दे दिया था क्योंकि वह पढ़ाई पूरी लगन और सही ढंग से करती थी। लेकिन चिंटू का बुरा हाल था। सारे प्रश्न उसकी पुस्तक से संबंधित होने पर भी कोई प्रश्न हल नहीं कर सका क्योंकि वह सिर्फ क्लास में प्रथम आने के लिए ही प्रमुख प्रश्न ही याद करता था।

 

 

 

 

 

चिंकी को सायकल कंपनी वालो ने एक बहुत बढ़िया सायकल के साथ ढेर सारा इनाम भी दिए थे क्योंकि उसकी पढ़ाई पूरी थी अधूरी नहीं। कोई भी कार्य पूर्ण ही अच्छा लगता है।

 

 

 

Small Stories in Hindi सौ रुपये की बात 

 

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

13- Very Very Short Stories in Hindi – मनुष्य जब हालात के विपरीत कदम बढ़ाता है तो उसे कठिनाई का सामना करना ही पड़ता है। लेकिन महान व्यक्ति के दिए हुए अमूल्य सुझाव पर अमल करके वह विपरीत हालात पर अंकुश लगा सकता है।

 

 

 

 

 

हीरा नगर में श्याम नाम का एक व्यापारी रहता था। उसका व्यापार अच्छा चल रहा था। एक दिन एक महात्मा सेठ के घर आये सेठ ने महात्मा का आदर सत्कार किया और बोला, “महाराज हमारे कल्याण के लिए कोई उपाय बताइये।”

 

 

 

 

महात्मा बोले, “मैं उपाय तो नहीं बताऊंगा लेकिन तुम्हे अच्छी बात जरूर बताऊंगा। जिसे अपनाकर तुम अपना कल्याण कर सकते हो लेकिन मैं एक बात कहने के एवज में 100 रुपये लूंगा।”

 

 

 

 

 

श्याम नाम का सेठ बोला, “महाराज मैं आपको पैसे दे दूंगा आप बात को बताइए।”

 

 

 

 

महाराज जी बोले, 1. “अगर कोई तुच्छ व्यक्ति बहुत बड़ा बन जाए तो उसे तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।” सेठ ने मुनीब से कहकर महाराज को 100 रुपये दिलवा दिया। फिर दूसरी बात बताने के लिए कहा।

 

 

 

 

 

महाराज जी बोले, “किसी भी व्यक्ति को देखकर अपने मन में कपट नहीं लाना चाहिए।” सेठ ने पुनः महाराज को रुपये प्रदान करवा दिए फिर तीसरी बात बताने का आग्रह किया।

 

 

 

 

 

महाराज बोले, 3. “जो कार्य अपने इच्छा के विरुद्ध हो उसे नहीं करना चाहिए।” सेठ ने फिर महाराज को पैसे दिलवा दिए और एक बात और बताने के लिए कहा।

 

 

 

 

 

महाराज बोले, 4.  “जहां अपना दिल रहने के लिए गवाही न दे वहां से हट जाना चाहिए।” सेठ ने महाराज को उनका पारिश्रमिक दिलवा दिया।

 

 

 

 

 

महाराज तो चले गए लेकिन सेठ ने अपने दुकान में महाराज की कही हुई बातों को लिखकर एक बोर्ड पर टंगवा दिया। कुछ समय व्यतीत होने के साथ ही सेठ का व्यापर घाटा देने लगा। अब वह अपने मुनीब के साथ वह स्थान छोड़कर दूसरे नगर में चला गया।

 

 

 

 

 

 

उस नगर का जो जमींदार था उसकी मौत हो गई थी। अब जमींदारी संभालने की बात आई तो सभी लोग बोले जो इस नगर में पहले प्रवेश करने वाला व्यक्ति होगा उसे ही जमींदार बना दिया जाएगा।

 

 

 

 

 

सेठ और मुनीब दोनों भूख से व्याकुल थे। सेठ ने मुनीब को खाने के लिए कुछ सामान लाने के लिए नगर में भेजा। लेकिन नगरवासियो ने उसे नगर में प्रवेश करते ही वहां का जमींदार नियुक्त कर दिया क्योंकि पहले जमींदार की मौत के बाद सेठ का मुनीब वहां पहुंचने वाला पहला व्यक्ति था।

 

 

 

 

 

अब सेठ मुनीब के नहीं आने से परेशान हो गया। वह खुद नगर में जाकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि उसका मुनीब तो यहां का जमींदार बन चुका है। वह जमींदार के पास जाने के पहले ही महात्मा द्व्रारा कही गई बात को याद कर लिया था।

 

 

 

 

 

सेठ जमींदार के पास जाकर उसे प्रणाम किया। जमींदार ने खुश होकर उसे अपना प्रधान सलाहकार नियुक्त कर दिया। जमींदार के पास बहुत सारे घोड़े थे। उस घुड़साल का रखवाला जमींदार की पत्नी के साथ मिलकर जमींदार को मारने का षणयंत्र रच रहे थे।

 

 

 

 

 

जिसे जमींदार के प्रधान सलाहकार ने देख और सुन लिया था। लेकिन उसने महात्मा की दूसरी बात को ध्यान में रखकर जमींदार की पत्नी और घुड़साल के रखवाले के प्रति कोई कपट भाव नहीं रखा।

 

 

 

 

लेकिन जमींदार की औरत व घोड़ो का रखवाला दोनों डर गए। जमींदार के प्रधान सलाहकार के खिलाफ जमींदार के कान भर दिए। लेकिन जमींदार अपने प्रधान सलाहकार का स्वभाव जानता था।

 

 

 

 

 

 

इसलिए उसने तरकीब से काम लिया जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। उसने अपने प्रधान सलाहकार को कसाई की दुकान से कुछ सामान लाने के लिए भेजा और कसाई को कह रखा था कि जो आदमी तुम्हारे पास आएगा उसे मार देना।

 

 

 

 

 

प्रधान सलाहकार को कसाई की दुकान पर जाना उचित नहीं लगा। वह एक नौकर को भेज दिया कसाई के पास। कसाई ने उस नौकर को मार डाला। महाराज की कही हुई तीसरी बात ( जो बात निकृष्ट लगे उसे नहीं करना ) के कारण ही प्रधान सलाहकार की जान बच पाई थी।

 

 

 

 

 

प्रधान सलाहकार ने सारी बात बता दिया था जमींदार को “कैसे उसके खिलाफ घोड़े का रखवाला और जमींदार की औरत” दोनों मिलकर षणयंत्र बना रहे थे।

 

 

 

 

जमींदार एकांत में अपने प्रधान सलाहकार से क्षमा याचना की क्योंकि उसे सब सच्चाई का पता चल गया था। जमींदार ने अपनी औरत के साथ ही घोड़े की रखवाली करने वाले को दण्ड दिया और प्रधान सलाहकार को अपना पद संभालने के लिए कहा।

 

 

 

 

 

लेकिन प्रधान सलाहकार को महाराज की कही हुई चौथी बात याद आ गई “जहां दिल उचट जाए या रहने की गवाही न दे” वहां नहीं रहना चाहिए। इसलिए वह जमींदार से बोला, “मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा और सेठ वहां से चला गया।

 

 

Short Stories in Hindi Language सलाह 

 

 

Hindi Short Stories

 

 

 

14- Short Hindi Stories – एक आदमी अगर अपनी तकलीफ की परवाह न करते हुए अगर किसी दूसरे आदमी की मदद करे तो उसे उसका फल व्याज सहित वापस मिल जाता है क्योंकि जो सबसे ऊपर बैठा है, वह किसी का किया हुआ अच्छा कार्य अपने पास नहीं रखता है। उसे दोगुना करके वापस दे देता है।

 

 

 

 

 

एक चोर था उसका नाम रामू था। वह चोरी करके ही अपना गुजारा करता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक चूहे से हो गई। चूहा बोला, “कहां जा रहे हो ?”

 

 

 

 

 

रामू बोला, “चोरी करने जा रहा हूँ।”

 

 

चूहा बोला, “कब तक तुम चोरी करते रहोगे। जाओ बुद्ध के पास जो पर्वत के उस पार रहते है। उनसे अपनी किस्मत के बारे में पूछो शायद कुछ अच्छा रास्ता मिल जाए।”

 

 

 

 

 

अब चोर रामू चल पड़ा बुद्ध से मिलने। उसे रास्ते में एक सुंदर महलनुमा हवेली दिखी। उसमे से एक आदमी निकल कर आया और रामू से पूछा, “कि तुम कहां जा रहे हो ?”

 

 

 

 

 

रामू बोला, “मैं बुद्ध के पास जा रहा हूँ उनसे अपनी किस्मत के बारे में पूछने।”

 

 

 

 

वह आदमी बोला, “तुम हमारा एक सवाल बुद्ध से पूछना कि हमारी एक 10 वर्ष की पुत्री है जो विकलांग है और वह चल नहीं सकती। इसका क्या कारण है।”

 

 

 

 

रामू बोला, “ठीक है मैं पूछ लूंगा।”

 

 

 

 

चलते हुए रामू के सामने बहुत बड़ा पहाड़ आया वह पहाड़ बर्फीला था। वहां एक बुढ़िया कई वर्षो से साधना कर रही थी। उसने रामू से पूछा, “तुम कहां जा रहे हो ?”

 

 

 

रामू ने उसे भी बताया मैं अपनी किस्मत के बारे में बुद्ध से पूछने जा रहा हूँ। बुढ़िया बोली, “तुम हमारे बारे में पूछना कि मैं इतने वर्षो से साधना कर रही हूँ अभी तक स्वर्ग नहीं जा पाई।”

 

 

 

 

बुढ़िया का प्रश्न सुनकर रामू जाने लगा तो बुढ़िया ने कहा तुम इस बर्फीले पहाड़ को पार नहीं कर पाओगे। मैं अपनी जादुई छड़ी से तुम्हे पर्वत के उस पार पहुंचा सकती हूँ और बुढ़िया ने अपनी जादुई छड़ी से रामू को पर्वत के उस पार पहुंचा दिया था।

 

 

 

 

अब रामू के सामने एक बहुत बड़ी नदी थी उसे कैसे पार किया जाए। रामू सोच ही रहा था कि उसके सामने एक मगरमच्छ आ गया और बोला, “तुम यहां क्यों खड़े हो ?”

 

 

 

 

रामू ने कहा, “मैं नदी के उस पार जाना चाहता हूँ जहां बुद्ध बैठे हुए है। मैं उनसे अपनी किस्मत के बारे में जानना चाहता हूँ।”

 

 

 

 

 

मगमच्छ ने कहा, “मैं तुम्हे नदी पार करा दूंगा लेकिन तुम मेरा भी एक प्रश्न बुद्ध से पूछ लेना। मैं एक ड्रैगन बनना चाहता हूँ लेकिन बन नहीं पा रहा हूँ।”

 

 

 

 

 

रामू ने कहा ठीक है। फिर मगरमच्छ ने उसे अपनी पीठ पर बैठाकर नदी पार करा दिया। रामू अब बुद्ध के पास पहुँच गया। वहां बहुत लोग बैठे हुए थे। बुद्ध केवल तीन प्रश्नो के उत्तर दे रहे थे।

 

 

 

 

 

रामू ने सोचा मैं अपने बारे में छोड़कर तीन लोगो के विषय में पूछता हूँ। उसने मगरमच्छ के बारे में पूछा तो बुद्ध बोले, “मगरमच्छ को अपना हिंसा वाला स्वभाव छोड़ना पड़ेगा और किसी मनुष्य की सहायता करनी पड़ेगी। वह भी आर्थिक रूप से तो वह ड्रैगन बन सकता है।”

 

 

 

 

 

रामू ने दूसरा सवाल पूछा, “बुढ़िया कई वर्षो से साधना कर रही है स्वर्ग जाने के लिए उसे क्या करना होगा ?”

 

 

 

 

बुद्ध ने कहा, “उस बुढ़िया को अपने छड़ी का मोह त्याग करना पड़ेगा तब ही वह स्वर्ग जा सकेगी।”

 

 

 

 

रामू का तीसरा सवाल था। वह विकलांग लड़की कैसे ठीक होगी ? बुद्ध ने कहा, “जो उस हवेली का मालिक है उसे अपनी हवेली में किसी भी अनाथ को शरण देने से उसकी लड़की ठीक हो जाएगी।”

 

 

 

 

 

रामू वापस लौट पड़ा। नदी के किनारे मगरमच्छ उसकी राह देख रहा था। रामू ने उसे बताया तुम्हे अपना हिंसक स्वभाव छोड़कर किसी भी व्यक्ति को आर्थिक मदद करनी पड़ेगी। तब तुम ड्रैगन अवश्य बन जाओगे।

 

 

 

 

 

मगरमच्छ पानी के अंदर से ढेर सारा मोती लाया और बोला, “मैं दूसरा आदमी कहां ढूंढूगा। इस सारे मोती को तुम रख लो।”

 

 

 

 

उसने सारा मोती रामू को दे दिया और उसे नदी पार करा दिया। उसके बाद मगरमच्छ ड्रैगन बन गया। रामू अब बुढ़िया के पास आ गया था। उसने बुढ़िया को बताया तुम अपनी यह जादू की छड़ी किसी को दे दो तब तुम स्वर्ग चली जाओगी।

 

 

 

 

बुढ़िया ने वह छड़ी रामू को दे दिया और खुश होकर स्वर्ग चली गई। अब रामू उस हवेली के पास गया। वहां उस हवेली का मालिक इंतजार करता हुआ मिला। रामू ने उसे कहा, “तुम इस हवेली में किसी अनाथ आदमी को आश्रय दे दो तुम्हारी लड़की ठीक हो जाएगी।”

 

 

 

 

 

वह आदमी बोला, “मैं अन्य किसी को कहां ढूढ़ता फिरूंगा आज से तुम ही इस हवेली में रहो।”

 

 

 

 

रामू वहां रहने लगा। हवेली में विकलांग लड़की ठीक हो गई। रामू जो एक चोर था अपने परोपकार के बल पर ही कालांतर में उस हवेली का मालिक बन गया।

 

 

 

नसीब कोई बदल नहीं सकता 

 

 

 

Hindi Short Stories

 

 

15- Very Short Stories For Kids in Hindi – किशन पुर गांव में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई का नाम मोहन और छोटा भाई का नाम सोहन था। दोनों भाई के पास जगह जायदाद बहुत कम थी। इसलिए दोनों भाई और लोगो के साथ ही गाय भैसों को चराते थे। मोहन होशियार था। वह अपना हर काम बड़े ही चतुराई के साथ करता था।

 

 

 

 

सोहन अलसी था और हर काम लापरवाही के साथ करता था। दोनों भाई किशोर से युवा हो गए थे। मोहन की शादी अच्छे घर की लड़की से हो गई और उसका संसार सुखपूर्वक चलने लगा। लेकिन सोहन को कोई भी पूछने वाला नहीं था जिससे उसकी जिंदगी घिसटते हुए बीत रही थी।

 

 

 

 

एक दिन भोले नाथ माता पार्वती के साथ “वृद्ध और वृद्धा” के रूप में कहीं जा रहे थे। सोहन ने वृद्ध पुरुष से पूछा, “बाबा आप कहां जा रहे हो ?” बृद्ध पुरुष ने कहा, “पास के गांव में जाना है बेटा”।

 

 

 

 

सोहन ने वृद्ध पुरुष और वृद्ध माता से कहा, “आप लोग थके हुए है। थोड़ा विश्राम कर ले, मैं आपकी सेवा के लिए कुछ प्रबंध करता हूँ।” इसपर वृद्ध पुरुष और वृद्ध माता ने कहा, “नहीं बेटा अपनी गाय और भैसों को देखो, हम लोग चले जाएंगे क्योंकि गांव नजदीक आ गया है।”

 

 

 

 

 

सोहन के बहुत आग्रह करने पर भी वृद्ध पुरुष रुकने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन वृद्ध माता ने कहा, “रुककर थोड़ा विश्राम कर लेते है और देखते है कि सोहन क्या सेवा करने वाला है ?”

 

 

 

 

 

 

सोहन ने दुबारा वृद्ध पुरुष और वृद्ध माता से आग्रह किया तो दोनों ही रुकने के लिए तैयार हो गए। सोहन दौड़ता हुआ अपनी गाय के पास गया और दो पात्रो में अपनी गाय का दूध लेकर आया। फिर आदर पूर्वक वृद्ध पुरुष वृद्ध माता को अर्पित किया।

 

 

 

 

दुग्ध प्रक्षालन के पश्चात वृद्ध पुरुष और वृद्ध माता दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए और कुछ देर विश्राम किया। “हम तुम्हारी सेवा से अतिप्रसन्न है और अब जाना चाहते है। तुम्हे जिस वस्तु की भी आवश्यकता हो मांग लो। हम उसे अवश्य ही पूर्ण करेंगे।” वृद्ध पुरुष और वृद्ध माता ने कहा।

 

 

 

 

सोहन ने अनमने ढंग से कहा, “हमारी समझ में नहीं आता है कि मैं आपसे क्या मांगू ?” सभी साथियों ने सोहन से कहा, “अपने लिए एक दुल्हन मांग, देख देते है ये लोग।”

 

 

 

 

सभी साथियों के कहने पर सोहन ने वृद्ध पुरुष और वृद्ध माता से कहा, “हमे एक अच्छी सी दुल्हन ही दे दो।” जगत पिता त्रिपुरारी और जगत माता पार्वती के लिए असंभव तो कुछ था ही नहीं कल इसी समय दुल्हन की सात डोलियां आएगी। तुम अपने लिए उनमे से अच्छी सी दुल्हन ढूंढ लेना।” इतनी बात सोहन से कहने के पश्चात वह वृद्ध और वृद्धा कुछ दूर जाकर विलुप्त हो गए।

 

 

 

 

दूसरे दिन सभी चरवाहे बहुत ही जल्दी अपने-अपने जानवर लेकर आ गए थे। यह देखने के लिए कि क्या सच में ही दुल्हनों की डोली आयी है। आश्चर्य से सभी चरवाहों की आंखे खुली ही रह गई क्योंकि उन्हें वहां सात दुल्हनों की डोली नजर आ रही थी।

 

 

 

 

 

सोहन के साथी उसका बड़ी ही बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन सोहन अपनी ही मस्ती में आ रहा था, उसे किसी बात का गम ही नहीं था।

 

 

 

 

सोहन का एक साथी उसके पास दौड़ता हुआ आया और सोहन से कहने लगा, “सोहन तम्हारे लिए तो दुल्हनों की लाइन लगी हुई है।” “कौन सी दुल्हन कैसी दुल्हन ?” सोहन बेरुखे अंदाज में कह रहा था।

 

 

 

 

 

चलकर खुद ही देख तेरे लिए ही बाबा ने दुल्हन भेज दिया है। डोली के नजदीक पहुंचने पर ही सोहन को बाबा द्वारा कही हुई बातें स्मरण हो उठी तो सोहन अपने मन में बहुत ही आनंदित हुआ। तुझे कौन सी दुल्हन पसंद है ? नजदीक से जाकर देख ले। सभी साथी सोहन से एक साथ बोल उठे।

 

 

 

 

सोहन प्रत्येक डोली से पर्दा उठाकर देखता और “ठीक नहीं है” कहकर आगे बढ़ जाता। सोहन क्रम से सभी डोली का पर्दा हटाकर देखता और इंकार करता हुआ आगे बढ़ जाता। सातवीं डोली के पास गया, उस पर मक्खियां भिनभिना रही थी, तो सोहन ने उस डोली के अंदर देखना उचित नहीं समझा दूर से ही कहने लगा “हां यही हमारे लिए उचित रहेगी।” कहकर चला गया।

 

 

 

 

शाम हो गई सभी चरवाहे अपने घर चले गए। सोहन भी अपने घर चला गया। उसने डोलो में बैठी उस दुल्हन की सुध ही नहीं ली। दुल्हन को सोहन की प्रतीक्षा थी।

 

 

 

 

उस दुल्हन ने बाबा को याद ( भोलेनाथ ) करते हुए कहा, “मैं यहां सुनसान जगह पर पड़ी हूँ सोहन का ठिकाना नहीं है कहां है वह ? आप हमारे लिए एक सुंदर से भवन की व्यवस्था करवा दीजिए।”

 

 

 

 

 

दुल्हन की प्रार्थना स्वीकार हो चुकी थी। जहां डोली रखी हुई थी उस जगह एक सुंदर भवन का निर्माण हो चुका था। सुबह होते ही सभी चरवाहे अपने जानवरों के साथ आ पहुंचे। वहां एक सुंदर भवन देखकर सभी चकित हो गए।

 

 

 

 

 

सबसे पीछे सोहन का आगमन हुआ। सोहन की दुल्हन ने एक चरवाहे की सहायता से सोहन को अपने पास बुलाया और उस चरवाहे को दो सोने का सिक्का देकर विदा किया। दुल्हन ने सोहन से कहा, “अब आप इन जानवरों को चराना छोड़ दो।” सोहन ने कहा, “क्यों ?”

 

 

 

 

 

इसपर सोहन की दुल्हन ने कहा, “क्योंकि अब आप इस सुंदर भवन के मालिक हो और अब आपको हमारे साथ ही इस सुंदर भवन में ही रहना होगा। अब आप गांव में नहीं जाओगे।”

 

 

 

 

सोहन ने दुल्हन से पूछा, “मैं गांव में क्यूं नहीं जाऊंगा ?”

 

 

 

“अब आप बड़े आदमी हो गए हो, जिसको मिलना होगा वह स्वतः ही आएगा।” दुल्हन ने सोहन से कहा और उसे खींचते हुए भवन के अंदर ले गई जहां नौकरों ने सोहन का काया पलट कर दिया।

 

 

 

 

 

वह चरवाहा जिसे सोहन की दुल्हन ने दो सोने के सिक्के दिए थे। शाम को घर पहुंचा और गांव में सभी को वह सोने के सिक्के दिखाए और कहा कि सोहन बहुत बड़ा आदमी बन गया है और उसने जानवरों को चराना भी छोड़ दिया है। यह बात मोहन को मालूम हुई तो वह ईर्ष्या से भर उठा और जाकर राजा को सोहन के खिलाफ भड़का दिया।

 

 

 

 

राजा ने अपने एक चाटुकार को सोहन के पास भेज दिया जिसका नाम गोलू था। गोलू सोहन से मिलने गया। गोलू और सोहन का वार्तालाप चल रहा था। सोहन की दुल्हन ने नौकरों को आवाज दी और गोलू का स्वागत करने के लिए कहा।

 

 

 

 

 

“अब आपका व्याह भी हो गया और इतने बड़े भवन के मालिक भी आप है, तो इस सबके उपलक्ष्य में भोज का आयोजन कब कर रहे है ?” गोलू ने सोहन से कहा। इसपर सोहन ने अपने ही अंदाज में गोलू से कहा, “इतनी भी जल्दी क्या है भोज का आयोजन हो जाएगा।” सोहन की दुल्हन ने सोहन को ठीक प्रकार तैयार कर राजसभा में जाने को कहा।

 

 

 

 

 

सोहन राजसभा में गया और राजा के बायीं तरफ बैठ गया। लेकिन राजा ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। सभा समाप्त होने पर सोहन भी अपने भवन में आ गया था। सोहन को भवन में आया हुआ देखकर दुल्हन ने पूछा, “आप राजसभा में कहां बैठे थे ?”

 

 

 

 

“मैं राजसभा में राजा के बायीं तरफ बैठा था।” सोहन ने दुल्हन से कहा। दुल्हन ने सोहन पुनः से कहा, “आज आपको राजा के दायी तरफ बैठना है।”  इसपर सोहन ने दुल्हन ने कहा, “अगर राजा ने कुछ कहा तो ?” दुल्हन ने कहा, “आकर हमें बताना।”

 

 

 

 

 

दूसरे दिन सोहन राजसभा में राजा के दाहिने जाकर बैठ गया। सभी दरबारी सोहन को इस तरह देख रहे थे जैसे रात में सूरज निकल आया हो। ( राजा के दाहिने वही बैठता है जो खुद को राजा से बड़ा समझता था ) अकस्मात गोपी सोहन के सम्मुख उपस्थित हुआ और कहने लगा, “आप भोज का निमंत्रण कब दे रहे हो ? क्योंकि आप राजा के दाहिने बैठे थे और आप खुद को राजा से बड़ा समझते हो।”

 

 

 

 

इसपर सोहन गोपी से कहा, “मैं कल आकर बताऊंगा।” सोहन अपने भवन में आकर अपनी दुल्हन को उलाहना दे रहा था। तुमने हमें राजा के दाहिने बैठने के लिए कहा था। अब सारे दरबारियों को भोज का निमंत्रण देना पड़ेगा, इतनी बड़ी व्यवस्था कैसे होगी ?

 

 

 

 

“आप बिलकुल ही चिंता मत करिए।” दुल्हन मोहन को समझाते हुए बोली। दुल्हन ने सोहन से पुनः कहा, “सारे दरबार ही क्यूं  , पूरे राज्य की प्रजा के साथ-साथ सारे दरबार को भी भोज का निमंत्रण दे देना, बाकी का कार्यक्रम मैं देख लूंगी।”

 

 

 

 

 

सोहन आज फिर राजा के दाहिने बैठा और बैठते ही कह उठा, “राज्य की पूरी प्रजा के साथ-साथ राजा और सारे दरबारी को हमारे यहां भोज का निमंत्रण है।” फिर वह स्वतः ही उठकर चला आया, और आते ही दुल्हन को सब बातें बता दी।

 

 

 

 

रात को दुल्हन ने बाबा से प्रार्थना की और सुबह होते ही सारी व्यवस्था हो गई। राज्य की सारी प्रजा और राजा के साथ सारे दरबारी खुश हो गए और राजा ने वही पर सोहन को अपने यहां भोज का निमंत्रण दिया और सारे दरबारी के साथ चले गए। प्रजा और सारे दरबारी सोहन की भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे।

 

 

 

 

दुल्हन ने बाबा से प्रार्थना की और दो आदमी के साथ एक उत्तम घोड़े की कामना की। बाबा ने दुल्हन की प्रार्थना स्वीकार की और दो आदमियों के साथ एक सुंदर मेघवर्ण घोड़े का आगमन हो गया था।

 

 

 

 

 

सोहन अपने दो आदमियों के साथ राजा के समक्ष उपस्थित हुआ। सोहन को देखकर गोपी ने पूछा, “अन्य लोग कहां है ? क्योंकि भोज्य की व्यवस्था बहुत ही बड़ी है।” सोहन ने कहा, “पहले हमारे इन दोनों आदमियों के लिए और हमारे घोड़े के लिए व्यवस्था कराओ।”

 

 

 

 

दोनों आदमियों के लिए भोज्य और घोड़े के लिए चारा कम पड़ गया लेकिन उन तीनों की क्षुधा पूर्ति नहीं हो सकी। राजा ने अपनी हार स्वीकार कर ली और सोहन को सदा ही राजा के दाहिने बैठने का अधिकार मिल गया।

 

 

 

कनक – विक्रम एक बेहद रोमांचक हिंदी कहानी ( Small Story in Hindi With Moral ) 

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

 

 

 

 

16- आज के इस समय में कोई भी समझने को तैयार नहीं जिसे देखो वही अपनी बात को सत्य बताने की कोशिस में लगा रहता है। इसलिए तो संसार सागर में जीवन नैया को समस्याओं का थपेड़ा खाने को मजबूर होना पड़ता है।

 

 

 

 

जीवन के दो पथिकों में से एक भी अगर संयम का परिचय दे तो हर समस्या का समाधान हो सकता है। जीवन के दो पथिकों में अहंकार का टकराव नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक के आहत से दूसरा भी हानि से नहीं बच सकता।

 

 

 

यह बात है शिवपुरी के रियासत के महाराज विक्रम की –

 

 

 

पूर्णिमा का चन्द्रमा अपने पूरे आकर्षण के साथ आसमान की यात्रा कर रहा था। राजा अपनी अर्धांगिनी कनक के साथ महल के छत पर चन्द्रमा का प्रतिबिंब निहार रहे थे। सहसा उन्हें रानी से परिहास करने की उत्कंठा जाग उठी।

 

 

 

 

 

विक्रम ने कनक से कहा, “कनक सामने देखो वह जो बैल आ रहा है, वह किस रंग का है बता सकती हो ? लेकिन एक शर्त है सुनो।”

 

 

 

 

कनक ने कहा, “क्या शर्त है महाराज।”

 

 

विक्रम ने कनक से कहा, “अगर तुम्हारी बात सत्य साबित होगी तो मैं राज्य छोड़कर चला जाऊंगा। अगर हमारी बात सत्य साबित होगी तो तुम्हे यह राजमहल छोड़कर जाना होगा।”

 

 

 

 

 

कनक ने कहा, “हमें आपकी शर्त स्वीकार है।”

 

 

 

विक्रम ने रानी से फिर कहा, “बताओ यह बैल किस रंग का है ?”

 

 

कनक ने कहा, “यह बैल सफ़ेद रंग का है।”

 

 

विक्रम ने कनक से कहा, “नहीं, वह बैल गुलाबी रंग का है।” इसी बात को लेकर दोनों आपस में बहस कर बैठे।

 

 

 

विक्रम ने कनक से कहा, “मैं अभी नौकर को भेजकर पता लगवाता हूँ। तभी फैसला होगा।” विक्रम ने अपने सबसे भरोसेमंद नौकर को बुलाकर कहा, “जाकर पता लगाओ कि सामने से जो बैल आ रहा है, वह किस रंग का है और शीघ्र ही आकर हमें बताओ।”

 

 

 

 

 

 

 

वह नौकर रानी का भी विश्वास पात्र था। रानी ने उसे इशारे में ही राजा के पक्ष में बताने के लिए कह दिया था। ( क्योंकि रानी ने राजा के सम्मान में अपना सम्मान त्यागना ही उचित समझा ) रामू नाम का वह नौकर कुछ देर के पश्चात विक्रम के समक्ष उपस्थित हुआ। बैल तो सफ़ेद ही था, लेकिन उसे रानी का इशारा याद था।

 

 

 

 

 

 

विक्रम ने रामू से पूछा, “बैल का रंग कैसा था ?”

 

 

 

 

रामू ने कहा, “बैल का रंग तो सफ़ेद ही था लेकिन वह देखने में गुलाबी प्रतीत होता था।” रामू ने विक्रम और कनक दोनों की मर्यादा को सुरखित रखने का प्रयास किया था।

 

 

 

 

विक्रम ने रामू से कहा, “सिर्फ एक ही रंग होना चाहिए। गुलाबी या सफ़ेद, दोनों नहीं हो सकता। विक्रम ने गुलाबी रंग पर जोर देकर कहा था। बैल गुलाबी रंग का ही था। रामू ने बात को राजा के पक्ष में मोड़ दिया था। रामू की बात को सुनते ही वहां सन्नाटा छा गया।

 

 

 

 

कनक ने कहा, “हमें अपनी पराजय स्वीकार है। शर्त के अनुसार मैं यहां से जा रही हूँ।” रानी ने राजमहल और राजा को प्रणाम किया और रात्रि के समय ही राजमहल को छोड़ दिया। राजमहल के बाहर रानी का विश्वास पात्र नौकर रामू सर झुकाए खड़ा था।

 

 

 

 

 

रामू कनक से कह रहा था, “आपने हमें झूठ बोलने पर मजबूर क्यूँ किया था। रानी साहिबा, जबकि वह बैल वास्तव में सफ़ेद ही था।”

 

 

 

 

इसपर कनक ने कहा, “तुम्हारा कहना सत्य है रामू , लेकिन तुम अगर राजा के सामने कहते कि बैल सफ़ेद है तो राजा शर्त हार जाते और उन्हें राज्य से बाहर जाना पड़ता और एक राजपूत को अपने प्राणों से प्यारा अपने राज्य वचन को निभाना उचित लगता है।जसके फलस्वरूप राज्य का संचालन अपूर्ण हो जाता। इसलिए मैंने हमने तुम्हे राजा के पक्ष में फैसला सुनाने के लिए कहा था।”

 

 

 

 

 

 

रामू ने कनक से पुनः कहा, “राजा को तो ऐसी शर्त मानने से इनकार कर देना चाहिए था क्योंकि आपके प्रसव का समय नजदीक आ रहा था।”

 

 

 

 

कनक ने कहा, “राजा का स्वाभिमान उनके सामने आ रहा था और हमने राजा के स्वाभिमान के साथ-साथ अपने प्रजा की भलाई के लिए अपने स्वाभिमान को आड़े नहीं आने दिया। जबकि मैं चाहती तो ऐसा कर सकती थी क्योंकि मैं भी एक राजपूत कन्या और एक राजपूत की स्त्री हूँ।”

 

 

 

 

 

रामू ने पूछा, “लेकिन आप ऐसी अवस्था में कहां जाएगी ?”

 

 

 

इसपर कनक ने रामू से कहा, “अपने राज्य की सिमा के बाहर एक बगीचा है वही पर हमारा स्थान होगा। अब तुम जाओ राजा के राज्य का ध्यान रखना।” यह कहकर कनक चली गई।

 

 

 

 

कनक को बगीचे में एक महात्मा का आश्रम मिला। उसने कुछ समय के उपरांत एक सुंदर से बालक को जन्म दिया।

 

 

 

 

रामू से विक्रम ने पूछा, “कनक चली गई ?”

 

 

रामू ने कहा, “हां महाराज, वह तो उसी दिन चली गई जब वह आपसे शर्त हार गई थी।”

 

 

 

राजा को बहुत ही पश्चाताप हो रहा था, लेकिन उनका स्वाभिमान आड़े आ गया था।

 

 

 

रामू ने फिर राजा से कहा, “अगर आप कहे तो रानी को लौटने की कोशिस करू।”

 

 

 

विक्रम ने कहा, “तुम्हारी कोशिस पूर्ण नहीं होगी क्योंकि वह एक राजपूत की कन्या और एक राजपूत की स्त्री है। क्षत्रिय कुल में जो अपनी बातों से पीछे हटता है वह राजपूत समाज की नजरों में गिर जाता है। इतिहास गवाह है हमारे पूर्वजों ने अपने वचन की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया है। प्राण जाए पर वचन न जाई’ वाली कहावत याद है तुम्हे।” रामू कुछ नहीं बोला

 

 

 

 

विक्रम ने पुनः कहा, “लेकिन कनक जहां भी हो कुशलता पूर्वक ध्यान देना यह तुम्हारे महाराज का आदेश है।”

 

 

 

 

उस बगीचे में एक महात्मा की कुटी थी। महात्मा 6 महीने से सोये हुए थे। अब उनका जागने का समय हो गया था। कनक के आने के उपरांत उस कुटी की व्यवस्था को सुचाल बना दिया था। सफाई के साथ महात्मा के उपयोग की हर वस्तु यथा स्थान रख दी गई थी ताकि महात्मा को किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े।

 

 

 

 

 

 

 

महात्मा अब जाग चुके थे। उन्होंने अपने कुटिया का अवलोकन किया और बहुत ही आनंदित हुए। महात्मा जी सोच मग्न थे उसी समय कनक अपने पुत्र प्रदीप के साथ आकर महत्मा को प्रणाम किया। महात्मा के पूछने पर उसने पूरा वृतांत कह सुनाया।

 

 

 

 

 

महात्मा ने कनक को एक छोटा लकड़ी का टुकड़ा देते हुए कहा, “इस लकड़ी के टुकड़े से तुम्हारे और तुम्हारे पुत्र की रक्षा होती रहेगी और तुम्हे सभी वस्तुए सुलभ होती रहेगी।” प्रदीप एक बहुत ही चंचल स्वभाव का लड़का था। महात्मा ने उसे एक छोटा सा डमरू दे रखा था। वह प्रायः उसी के साथ खेलता रहता था।

 

 

 

 

 

 

बगीचे के दूसरे सिरे पर एक नदी थी और उसका परवाह अविरल होता रहता था। उसी नदी के रास्ते से प्रायः वणिक लोग अपने व्यापर के सिलसिले में आया जाया करते थे। नदी के तट पर सुरम्य स्थान देखकर वह वणिक लोग अपनी नाव को रोककर विश्राम कर रहे थे। बालक प्रदीप अपनी बाल सुलभ आचरण के कारण उन लोगों के समीप जाकर अपनी जिज्ञासा को बताई।

 

 

 

 

 

 

 

प्रदीप एक वणिक से पूछा, “आप लोग कहां जा रहे है ?”

 

 

वणिक ने कहा, “हम लोग व्यापारी है और व्यापर के सिलसिले में दूसरे नगर को जा रहे है।”

 

 

 

यह सुनकर प्रदीप ने कहा, “क्या हमें भी अपने साथ ले चलेंगे ?”

 

 

 

वणिक ने प्रदीप से कहा, “अगर तुम्हारी इच्छा घूमने की है तो हमारे साथ चल सकते हो।”

 

 

 

कुछ दिन विश्राम करने के उपरांत वणिकों का समूह नाव द्वारा चल पड़ा उसमे प्रदीप भी था। प्रदीप को न पाकर कनक बेचैन हो उठी। उसकी हालत उस मछली की तरह हो गई थी जिसे पानी से निकालकर बाहर कर दिया गया था। यानी जल बिन मछली की तरह।

 

 

 

 

 

 

कनक ने सारी बातें महात्मा जी को बताई, कि वह बाग़ के दूसरे किनारे पर खेलता हुआ गया और लौटकर नहीं आया। महात्मा ने कनक से पूछा, “क्या प्रदीप के पास वह ‘डमरू’ है जो हमने उसे दिया था ?”

 

 

 

 

 

कनक ने महात्मा से कहा, “प्रदीप वह ‘डमरू’ सदैव ही अपने पास रखता है।”

 

 

 

 

महात्मा जी ने कहा, “तो अब चिंता का कोई कारण ही नहीं है क्योंकि उस डमरू के रहते प्रदीप के ऊपर कोई संकट आ ही नहीं सकता।” महात्मा की बातों से कनक पूर्ण आश्वस्त हो गई।

 

 

 

 

 

विक्रम से शर्त हारने के कारण “कनक” ने राजमहल का त्याग किया था। उसी दिन से विक्रम बहुत ही व्यथित था क्योंकि सिर्फ उसकी मर्यादा को रखने के लिए कनक ने यह कदम उठाया था। इस बात का विक्रम को एहसास हो गया था लेकिन स्वाभिमानी की लड़ाई में विक्रम जीत कर भी हार गया था।

 

 

 

 

 

 

रामू ने विक्रम को सारा घटना क्रम बताया था और रामू से ही ज्ञात हुआ कि कनक ने एक पुत्र को जन्म दिया है। विक्रम को अपने पुत्र को देखने की इच्छा जागृत हो उठी। लेकिन वह समय अभी नहीं आया था।

 

 

 

 

वणिक लोग अपनी नाव लेकर नदी के रास्ते जा रहे थे। अचानक उन लोगों की नाव एक खास जगह पर रुक गई। सभी लोगों ने अपने-अपने स्तर से प्रयास किया लेकिन नाव को चलना ही नहीं था और वह चली भी नहीं। प्रदीप ने एक वणिक से कहा, “अगर आप कहे तो मैं प्रयास करु शायद कुछ सफलता हासिल हो जाए।”

 

 

 

 

 

सबने एक स्वर में कहा,  “अवश्य ही प्रयास करो।”

 

 

 

 

सभी की सहमति से प्रदीप नदी में उतर गया और देखा कि किसी के जबरन प्रयास से नाव रुकी हुई है। नाव के निचले तल में बड़े से बांस के सहारे रोका गया था। प्रदीप उसी बांस के सहारे पानी में उतरता गया। महात्मा का दिया हुआ “डमरू” उसके पास था इसलिए उसे स्वतः मार्ग मिलता चला गया।

 

 

 

 

जल के भीतर एक सुरक्षित जगह पर बहुत ही सुंदर महल था। वहीं से बांस का अवरोध लगा हुआ था, जिस कारण से नाव रुकी हुई थी। प्रदीप उस वरोध को रोकने का प्रयास ही कर रहा था कि उस महल का दरवाजा खुला और एक बुजुर्ग सामने आया और बड़े ही आदर के साथ प्रदीप को अपने महल में ले गया। प्रदीप का उचित आदर सत्कार किया गया।

 

 

 

 

उस बुजुर्ग ने प्रदीप से कहा, “हम लोग कितने वर्षो से आप की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन …… वह बुजुर्ग अपनी ही धुन में कहे जा रहा था। हमारे गुरुदेव की भविष्य वाणी सच हुई और आज आपके दर्शन हो गए।”

 

 

 

 

 

प्रदीप ने उस बुजुर्ग से पूछा, “क्या कहा था आपके गुरुदेव ने ?”

 

 

 

 

इसपर बुजुर्ग ने कहा, “हमारे गुरुदेव ने हमसे कहा था कि आज से 25 वर्ष के बाद एक नौजवान का तुम्हारे यहां आगमन होगा। तुम उसकी सहायता करना अन्यथा तुम अपने महल और परिवार केसाथ इस जल में विलीन हो जाओगे। तब से मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था।”

 

 

 

 

बुजुर्ग ने प्रदीप से पुनः कहा, “आपका नाम शायद प्रदीप है।”

 

 

 

 

प्रदीप अपना नाम सुनकर और चौक पड़ा। प्रदीप उस बुजुर्ग से कहा, “हमारा नाम प्रदीप है और मैं व्यापारियों के साथ यात्रा पर जा रहा था कि अचानक यह अवरोध उत्पन्न हो गया।”

 

 

 

“अगर यह अवरोध उत्पन्न नहीं होता तब आपके दर्शन भी दुर्लभ हो जाते।” बुजुर्ग के स्वर में उलाहना थी। इसपर प्रदीप बुजुर्ग से बोला, “अब आप हमें आज्ञा दीजिए हमारे साथी व्यग्रता से हमारी प्रतीक्षा कर रहे है।”

 

 

 

 

 

जाने से पहले हमारे कुलदेवी के दर्शन कर ले और इस कन्या का पाणिग्रहण भी कर ले उस बुजुर्ग ने एक अत्यंत रूपमती कन्या की तरफ इशारा करते हुए कहा। कुल देवी मंदिर में दर्शन और अर्पिता के साथ पाणिग्रहण होने के बाद ही प्रदीप को जाने की इजाजत मिली।

 

 

 

 

 

“आपकी वापसी में प्रतीक्षा रहेगी।” बुजुर्ग ने प्रदीप से कहा। प्रदीप ने सहमति से सर हिलाया और बुजुर्ग का आशीर्वाद लेने के उपरांत बिदा लिया। प्रदीप के जल से बाहर आने के पश्चात अवरोध हट चुका था। आगे की यात्रा के लिए सभी वणिकों ने प्रस्थान किया।

 

 

 

 

 

एक महीने की यात्रा के पश्चात पुनः उसी प्रकार अवरोध उत्पन्न हुआ। इस बार किसी ने प्रयास करना उचित नहीं समझा क्योंकि सभी को मालूम था प्रयास में सफलता की गारंटी शून्य है। जिस प्रकार चातक पक्षी की नजरे स्वाति नक्षत्र की एक बूंद की तरफ लगी रहती है। उसी तरह सभी एकटक प्रदीप का अवलोकन कर रहे थे।

 

 

 

 

सभी लोगों के देखते ही प्रदीप ने जल में छलांग लगा दी। महात्मा का दिया हुआ “डमरू” प्रदीप के पास था। इसलिए किसी प्रकार की बाधा सामने उपस्थित होने का प्रयास नहीं किया। प्रदीप आराम के साथ-साथ उस द्वार के पास पहुंच चुका था जहां से वह अवरोध उत्पन्न हो हुआ था।

 

 

 

 

 

एक रक्षक उस द्वार पर खड़ा था। एक मनुष्य को जल के भीतर आया हुआ देखकर क्रोधित और चकित भी हुआ। शायद यह महात्मा के दिए हुए उस ‘डमरू’ का ही प्रभाव था। जो द्वार पर रक्षक था वह भी प्रदीप के सामने नतमस्तक हो गया।

 

 

 

 

 

 

कौन है दरवाजे पर ? वनराज – उसे सम्मान के साथ लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित हो। अंदर से एक महिला का रौबदार लेकिन सम्मान के साथ कहा हुआ वाक्य वापस गूंजा था।

 

 

 

 

वनराज वास्तव में ही वनराज था लम्बा डील डौल वलिष्ट देह यष्टि के साथ ही आंखे छोटी किन्तु सतर्क, रक्षक प्रदीप को लेकर एक गुफा के अंदर गया। गुफा के अंदर पहुंचने पर प्रदीप ने जो देखा वह अतिकौतुक से भरा हुआ था।

 

 

 

 

 

एक बड़ी सी मछली के ऊपर एक सुंदर स्त्री पद्मासन की मुद्रा में बैठी हुई थी। उसके बगल में ही मत्स्य सिंहासन के ऊपर एक सुनहरे बालों वाली एक दिव्यकन्या विराजमान थी। जो विशालकाय जलचरों से सुरक्षित थी।

 

 

 

 

 

 

आइए “महाराज विक्रम पुत्र प्रदीप” आपका इस सागर की अथाह जलराशि में स्वागत है और प्रदीप इस प्रकार का संबोधन सुनकर एक बारगी चौक पड़ा क्योंकि यहीं उसे ज्ञात हुआ कि वह किसी विक्रम का पुत्र है।

 

 

 

 

 

प्रदीप थोड़ा रुष्ट होता हुआ बोला, “आप जो भी है नमन है आपको। लेकिन आप हमें बातों में उलझाकर हमारा और अपना समय व्यर्थ मत करें। हमें अभी आगे के लिए प्रस्थान कारना है।

 

 

 

 

प्रदीप को मालूम था कि महात्मा के दिए हुए डमरू से वह पूर्णतया सुरक्षित है। लेकिन उसे थोड़ा ग्लानि भी हुई क्योंकि उसके समक्ष सभी लोग सम्मान प्रति दर्शित कर रहे थे।

 

 

 

 

 

राजकुमार प्रदीप ने कहा, “अगर तुम्हे जल्दी ही पहुंचना है तो तुम्हे कुछ ही पलों में तुम्हारे साथियों के साथ तुम लोगों को गंतव्य तक पहुंचा सकते है।” कभी विक्रम पुत्र प्रदीप, कभी राजकुमार प्रदीप ऐसा संबोधन सुनकर प्रदीप की उत्सुकता बढ़ गई।

 

 

 

 

 

जबकि प्रदीप को अपने पिता का नाम पता कुछ भी नहीं मालूम था और प्रदीप की जानकारी के अनुसार वह राजकुमार तो था ही नहीं, लेकिन प्रदीप ने अपनी उत्सुकता को दबाए ही रखा।

 

 

 

 

 

 

आप शायद हैरत में पड़ गए होंगे कि हमें आपके बारे में इतनी जानकारी कहां से प्राप्त हुई ?  मैं बताती हूँ आपको। “यहां के सभी जलचर हमारा आदेश मानने को विवश है क्योंकि मैं यहां के सभी जलचरों की महारानी हूँ और हमारे बगल में बैठी यह कन्या स्वर्ण प्रभा हमारी अपनी संतान है।”

 

 

 

 

 

 

उसने फिर आगे बताया, “हमारे इस साम्राज्य के स्वामी मत्स्य राज स्वर्गारुढ़ हो चुके है। उन्होंने ही हमें बताया था कि यहां 30 साल के उपरांत जो सुंदर राजकुमार आएगा वह हमारे मित्र महाराज विक्रम का पुत्र ही होगा क्योंकि उसके पास एक ‘डमरू’ होगा। अगर वह डमरू आपके पास नहीं होता तो आप भी साधारण मानव की भांति यहां से बचकर नहीं जा सकते थे।”

 

 

 

 

मछली के ऊपर बैठी हुई वह सौंदर्य की स्वामिनी जिसका नाम तारा था उसने प्रदीप से कहा, “एक समय समुद्री शिकारियों ने मत्स्य राज के ऊपर आक्रमण कर दिया और उस मुकाबले में मत्स्यराज घायल होकर समुद्र के किनारे जा लगे। शिकारी मत्स्यराज का जीवन लेने पर ही उतारू थे।

 

 

 

 

 

तारा ने प्रदीप से पुनः कहा, “सहसा उधर से महाराज विक्रम का आगमन हो गया शायद वह आखेट करके आ रहे थे। उन्होंने मानवता दिखाई और मत्स्यराज की सेवा सुश्रुषा की जिससे मत्स्यराज स्वस्थ हो गए। उन्होंने राजा विक्रम की सहायता का वचन दिया। फिर दोनों अपने-अपने घर को लौट गए।”

 

 

 

 

 

प्रदीप उसकी बात को बड़े ध्यानपूर्वक सुन रहा था। उसने प्रदीप को आगे बताया, “मत्स्यराज ने हमें सब बात बताई उसके कुछ समय के उपरांत उनका स्वर्गवास हो गया। 30 वर्षों के बाद भी उनकी एक कही हुई बातें अक्षरशः सत्य साबित हो रही है। मत्स्यराज के कथन के अनुरूप आपको इस कन्या “स्वर्ण प्रभा” का पाणिग्रहण करना होगा।”

 

 

 

 

तारा ने स्वर्ण प्रभा को बुलाकर उसका हाथ प्रदीप के हाथ में सौप दिया। प्रदीप ने कहा, “अब हमें यहां से जाने की अनुमति दे, क्योंकि हमारे साथी वहां अपनी नाव में हमारा इंतजार कर रहे होंगे।”

 

 

 

 

“अब आप अवश्य ही जा सकते है।” तारा ने प्रदीप से कहा और आज्ञा दी। प्रदीप अपने वणिक साथियों के मध्य पहुंच चुका था। आगे की यात्रा आरंभ हो चुकी थी। वणिक लोगों के अपने देश से सुदूर देश में आए बहुत समय व्यतीत हो चुका था। उन लोगों को व्यापर में भरपूर फायदा हुआ।

 

 

 

 

 

 

सभी के बीच सहमति बनी कि अपने देश के लिए प्रस्थान करना चाहिए। उसके बाद वणिक लोग अपने देश के लिए चल पड़े। यात्रा के पहले पड़ाव पर वणिक लोगों की नाव स्वतः ही रुक गई। फलस्वरूप प्रदीप जल में उतर कर अंदर गया। तारा के साथ स्वर्ण प्रभा भी प्रदीप की प्रतीक्षा कर रही थी।

 

 

 

 

 

 

तारा ने अपनी पुत्री स्वर्ण प्रभा को अमूल्य आभूषणों के साथ एक स्वचालित नाव में बैठाकर विदा किया और कहा, “स्वर्ण प्रभा हर चुनौतियों से बखूबी निपटने की क्षमता रखती है। फिर भी हमारी आवश्यकता होने पर हमे याद करना, मैं आपकी सहायता के लिए स्वयं ही उपस्थित हो जाऊंगी।” तारा से आज्ञा लेकर प्रदीप अपने साथियों सहित आगे प्रस्थान किया।

 

 

 

यात्रा में दूसरी जगह पर भी नाव स्वतः रुक गई और प्रदीप ने स्वर्ण प्रभा को प्रतीक्षा करने के लिए कहा और जल के अंदर चला गया। वहां पर भी बुजुर्ग आदमी ने अपनी कन्या अर्पिता के साथ प्रदीप की प्रतीक्षा कर रहा था।

 

 

 

 

उसने भी सब वृतांत सुनकर समय व्यर्थ करना उचित नहीं समझा और बहुमूल्य आभूषणों के साथ ही एक नाव पर अर्पिता को प्रदीप के साथ अश्रुपूरित नयनों के साथ विदा किया। उसे ज्ञात था कि अर्पिता स्वयं चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है। तथापि उसका संरक्षण मजबूत हाथों में सुरक्षित है।

 

 

 

 

प्रदीप को एक अन्य औरत के साथ आया हुआ देख कर अपार आश्चर्य हुआ और सभी लोग अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान  कर गए। निश्चित समय पर सभी नाव ( जिसमे दो नाव प्रदीप के पत्नियों की थी ) बाग़ के तट पर पहुंचकर रुक गई। जहां से प्रदीप उन वणिक लोगों के साथ यात्रा गमन किया था।

 

 

 

 

 

“कनक” प्रदीप की माँ का बुरा हाल था। वह महात्मा जी के पास जाकर कहने लगी, “महात्मा जी अपने तो कहा था प्रदीप सकुशल लौट आएगा। लेकिन इतने दिन बीत गए प्रदीप की कोई सूचना अभी तक हमें प्राप्त नहीं हुई।”

 

 

 

 

 

 

धीरज रखो पुत्री अब कुछ ही पलों की बात है। अब तुम्हारे लिए शुभ ही नहीं सुनहरे दिवस का आगमन हो चुका है। तभी महात्मा की कुटी के चारो तरफ पक्षियों का मधुर स्वर गूंजने लगा और छोटे-छोटे मृग शावक अपनी माता मृगी के साथ उछल कूद करने लगे। महात्मा जी ऐसे शुभ शगुन को देखकर मुस्कुराने लगे।

 

 

 

 

 

राजा विक्रम ने रामू को बुलाकर कहा, “अब हमारिम शक्ति क्षीण हो रही है। तुम जाकर कनक से कहो अपने पुत्र के साथ राज्य में वापस आ जाए। कनक के साथ-साथ अपने पुत्र को देखने की प्रबल इच्छा है।”

 

 

 

 

प्रदीप ने अपने वणिक साथियों को बहुत मूलयवान वस्तुओं के साथ विदा किया। उसके उपरांत सोच में पड़ गया। “आप अकारण ही किस सोच में डूब गए है ?” एक साथ अर्पिता और स्वर्ण प्रभा ने प्रदीप से पूछा। प्रत्युत्तर में प्रदीप ने उन दोनों से ही प्रश्न कर दिया, “इतने सारे बहुमूल्य सामान हम तीनों से किस तरह जाएंगे ?”

 

 

 

 

 

अर्पिता और प्रभा ने एक साथ प्रदीप से एक साथ कहा, “शायद आपको अपनी और हम  शक्तियों का अंदाजा नहीं है।” दोनों ने कुछ इस तरह से कहा कि प्रदीप झेप गया। अर्पिता और प्रभा ने एक साथ ताली बजाई बहुमूल्य सामानों से भरी हुई नाव पांच आदमियों में बदल गई।

 

 

 

 

उन सबों ने सभी आभूषणों और बहुमूल्य सामानों को अपने-अपने सर के ऊपर स्वर्ण पत्रों में रखा और प्रदीप, अर्पिता, स्वर्ण प्रभा के साथ-साथ महात्मा की कुटी की तरफ प्रस्थान किए। कनक प्रदीप के साथ-साथ दो अप्रतिम अद्वितीय सुंदरियों को देखकर विस्मित रह गई जबकि महात्मा जी मुस्कुराते जा रहे थे।

 

 

 

 

“आप अपने मूलधन के साथ-साथ आए व्याज का भी स्वागत करिए।” महात्मा ने कनक से कहा।

 

 

 

 

 

यह सुनकर कनक की तंद्रा भंग हुई। उसने प्रदीप के साथ उन दोनों सौंदर्य का स्वागत किया जो प्रदीप के साथ आये थे। रामू एक तरफ खड़ा होकर यह दृश्य देख रहा था। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया तो वह कनक के सामने उपस्थित होकर कहने लगा, “रानी साहिबा, आपको महाराज ने याद किया है। आपको राजमहल में चलना होगा।”

 

 

 

 

कनक ने रामू से कहा, “मैं एक राजपूत की लड़की और एक राजपूत की औरत हूँ। हमे राजमहल में इस तरह जाना क्या उचित रहेगा ? यह बात महारज से कह देना महाराज स्वयं ही समझ जाएंगे।”

 

 

 

 

रामू ने लौटकर महाराज विक्रम को “कनक” का संदेश कह सुनाया। विक्रम ने रामू को आदेश दिया, “जाकर दो रथ तैयार करके ले आओ हमें अभी और इसी समय कनक को सम्मान के साथ वापस लाना है।”

 

 

 

 

रामू ने बहुत तीव्रता के साथ दो रथ लेकर उपस्थित हुआ। यह समाचार सुनकर राज्य की सारी प्रजा अपने प्रिय रानी के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त हो गई। बगीचे में महात्मा की पर्णकुटी के समक्ष राजा अपने दोनों रथ के उपस्थित थे।

 

 

 

 

राजा ने महात्मा की उपस्थिति में रानी को ससम्मान रथारूढ़ किया तो कनक ने अपने पुत्र और दोनों बधुओं को भी दूसरे रथ में आरूढ़ होने का आदेश दिया। आज राजा विक्रम के हर्ष का ठिकाना न था। अपने पुत्र के साथ दोनों बधुओं का अवलोकन करके फूले नहीं समा रहे थे।

 

 

 

 

 

महात्मा ने राजा से कहा, “राजन आपने अपने स्वाभिमान वस ऐसा कार्य किया जो नियम के सर्वथा विपरीत था। “जीवन की नैया” को संसार के सागर से पार लगाने के लिए दो संयुक्त पथिकों के बीच स्वाभिमान का टकराव नहीं होना चाहिए अन्यथा बहुत बड़ी हानि हो सकती है।”

 

 

 

 

 

 

राजा विक्रम ने महात्मा से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और दुबारा ऐसा नहीं होगा इसका वचन दिया। फिर अपने राज्य के लिए प्रस्थान कर गए।

 

 

 

 

 

प्रजा जनों ने अपने राजा के साथ अपनी प्रिय रानी को देखा तो अति आनन्दित हुई। राजा विक्रम ने अपने पुत्र प्रदीप को राज्य सौपकर बधुओं को आशीर्वाद दिया और रानी कनक के साथ राज्य कार्य से विरक्त होकर ईश्वर भक्ति में लीन हो गए।

 

 

 

 

जादूगरनी लखिया ( एक जादुई कहानी )

 

 

 

Hindi Short Stories

Hindi Short Stories

 

 

17- वह जादूगरनी बहुत ही खतरनाक औरत थी।वह अपना आदेश मानने के लिए सबको विवश कर देती थी। उसका नाम लखिया था। जासोपुर एक क़स्बा था। उसी कस्बे में लखिया का जादुई मकान था। जादुई इसलिए कि उसके पास ढेर सारे जानवर थे, जो उसके जादू के प्रभाव से और लखिया का आदेश न मानने के कारण जानवर के स्वरूप में प्रताणित हो रहे थे।

 

 

 

 

लखिया के बाप का नाम घर घुम्मन था क्योंकि वह पूरा दिन घूम-घूमकर पता लगाता था, कि आज जासोपुर में में कौन नया आदमी आया है। कोई नया आदमी आने पर वह लखिया को इसकी जानकारी देता था। लखिया घर घुम्मन की पुत्री थी।

 

 

 

 

 

नए आदमी की जानकारी प्राप्त होने पर वह उस नए आदमी को अपने पास बुलाती और अपना आदेश कोई भी सुनाती जो आदमी उसके आदेश का पालन करता उसकी जान बच जाती और जो उसके आदेश का उल्लंघन करता उसे वह पशु या पक्षी बनाकर दंड देती। इसमें उसे और उसके पिता को अति आनंद आता था।

 

 

 

 

 

 

नए आदमियों को अक्सर लखिया के विषय में मालूम नहीं रहता था। इसलिए वह उसे साधारण स्त्री समझने की भूल कर बैठते और उसका आदेश मानने से इनकार करके अपने लिए मुसीबत ले लेते थे।

 

 

 

 

 

जादूगरनी लखिया ने एक बिल्ली पाल रखी थी। वह बिल्ली के सर के ऊपर एक जलता हुआ दीपक रख देती थी और उसी के सहारे अपने मंत्र का प्रयोग वह किसी अन्य के ऊपर करने में सफल हो जाती थी। किस्मत भी लखिया के ऊपर मेहरबान थी क्योंकि आज तक कोई उसे और उसकी जादुई की कला को ललकारने वाला नहीं मिला था।

 

 

 

 

किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान। वाली कहावत उसके ऊपर चरितार्थ हो रही थी। कितना चालाक खिलाडी हो उसे कभी न कभी अपने से उत्तम खिलाडी से मुलाकात हो ही जाती है। लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी होती है। मदमत्त हाथी को रोकने वाला भी मिल जाता है। समय चक्र घूमने के साथ लखिया को भी मिलेगा।

 

 

 

 

मनोहर पुर राज्य में दामोदर नाम के राजा का शासन था। उनके पांच लड़के थे। पांचों लड़को का विवाह हो चुका था। उनके राज्य में प्रजा हर प्रकार से सुखी थी। एक दिन राजा का छोटा लड़का हरेंद्र अपने राज्य से बाहर गया तो वापस नहीं लौटा।

 

 

 

 

 

राजा के चारो लड़के और पांचों बहुओं को हरेंद्र की चिंता सताने लगी क्योंकि वह अपने सभी भाइयों में छोटा था और सबका दुलारा था। जासोपुर कस्बे की एक सराय में एक नया आदमी आकर रुका था क्योंकि वह अपने घर का रास्ता भटक गया था। घर घुम्मन उस सराय में आया और उसका परिचय प्राप्त किया।

 

 

 

 

 

घर घुम्मन को परिचय से मालूम हुआ कि भटका हुआ पथिक राजपरिवार से संबंधित है। उसका नाम हरेंद्र है और वह सुबह होते ही अपने राज्य चला जायेगा। लेकिन घर घुम्मन से मुलाकात होने पर जासोपुर कस्बे से निकलना मुश्किल ही नही असंभव था।

 

 

 

 

 

हरेंद्र को अच्छी सुख सुविधा का लालच देकर उसे अपने साथ घर ले आया और अपनी पुत्री लखिया से उसका परिचय करवा दिया फिर निकल पड़ा अपने शिकार की तलाश में। मनोहर पुर के राजा की छोटी बहू का नाम नीरजा था।

 

 

 

 

 

 

एक दिन नीरजा ने राजा दामोदर से कहा, “पिताजी, आपके लड़के को गए बहुत समय बीत चुका है। अपने और अन्य लोगों ने भी हरेंद्र को ढूंढने का अथक प्रयास किया, लेकिन परिणाम केवल शून्य ही निकला। अतः मैं आपसे हरेंद्र को ढूंढने के लिए आज्ञा चाहती हूँ।”

 

 

 

 

 

दामोदर ने नीरज से कहा, “तुम भी प्रयास करके देख लो पुत्री शायद तुम्हे ही सफलता मिल जाय और राजा दामोदर उदास हो गए।” उसके बाद नीरजा हरेंद्र की खोज में प्रस्थान कर गई।

 

 

 

 

 

जादूगरनी लखिया ने राजकुमार हरेंद्र को देखा तो चौक पड़ी। इतना सुंदर मनुष्य उसके जीवन में पहली बार आया था। उसे अपनी मन की इच्छा पूर्ण होती प्रतीत हुई। जिस प्रकार बिल्ली के लाख प्रयास के बाद भी छींका नहीं छूटता है, ठीक वैसी ही स्थिति जादूगरनी लखिया की थी।

 

 

 

 

 

 

राजकुमारी हरेंद्र रूपी छींका को लखिया रूपी बिल्ली नहीं तोड़ पाई। इसलिए उसने अपनी खीझ मिटने के लिए हरेंद्र को अपनी जादुई कला का एहसास करा दिया। हरेंद्र को अपनी मंत्र के द्वारा तोता बना दिया और उसे एक पिंजरे में बंद कर दिया।

 

 

 

 

 

 

जादूगरनी लखिया प्रत्येक रात्रि को पिंजरे से तोते को निकालकर मनुष्य बनाती उसके साथ चौसर खेलती और उसका हर प्रयास रहता कि राजकुमार हरेंद्र उसका मूल्यांकन करे। लेकिन लखिया हर बार अपने प्रयास में असफल हो जाती और खीझकर उसे पुनः तोता बनाकर पिंजरे में कैद कर देती थी।

 

 

 

 

 

नीरजा राजकुमार को ढ़ंढते हुए उसी जासोपुर कस्बे में पहुंची जहां से जादूगरनी लखिया ने राजकुमार को बुलवा कर तोता बनाया और पिंजरे में कैद कर दिया था। नीरजा को जासोपुर के लोगों से ज्ञात हुआ कि यहां घर घुम्मन नाम के आदमी की पुत्री बहुत बड़ी जादूगरनी है और उसका नाम लखिया है।

 

 

 

 

 

 

जासोपुर में नए आए हुए लोगों को घर घुम्मन अपने लड़की के पास पहुंचा देता और आए हुए आदमियों से लखिया कुछ प्रश्न पूछती लेकिन संतुष्ट नहीं होने पर उन लोगों को पशु या पक्षी के रूप में बदल देती थी।

 

 

 

 

 

नीरजा को स्वयं भी जादुई विद्या का अच्छा ज्ञान था। वह जासोपुर में ही सात चूहों की खरीददारी कर अपने पास रख लिया क्योंकि समय आने पर वही चूहे उसकी सहायता करने वाले थे। घर घुम्मन नीरजा को अपने साथ लिए लखिया के पास पहुंचा और नीरजा को वहां छोड़कर चला गया।

 

 

 

 

 

 

नीरजा को अपने जादू के ज्ञान से मालूम हो चुका था कि लखिया ने बहुत लोगों को पशु-पक्षी बना रखा है। एक दिन नीरजा ने अकस्मात ही लखिया से पूछ लिया, “तुमने इतने सारे लोगों को पशु-पक्षी क्यों बना रखा है ?”

 

 

 

 

 

 

नीरजा के अकस्मात ही ऐसा प्रश्न पूछने पर लखिया चौक गई और पूछा, “तुम्हे कैसे मालूम हुआ ?” क्योंकि लखिया को मालूम था कि बगैर जादुई ज्ञान के किसी को मालूम होना असंभव था, कि यहां पशु-पक्षियों के रूप में आदमियों को कैद में रखा गया है। नीरजा ने लखिया को कहा, “तू, अकारण ही इतने सारे लोगों को दण्ड दे रही हो।”

 

 

 

 

 

लखिया थोड़ा तल्प होकर बोली, “यहां हमारी मर्जी चलती है। अगर तुम्हे इन लोगों से ज्यादा ही हमदर्दी है तो इन्हे आजाद करा लो।” इसपर नीरजा ने कहा, “मैं इन लोगों को तुम्हारे कैद से आजाद करा ही लूंगी।”

 

 

 

 

 

 

नीरजा के प्रयास से आधे लोगों को लखिया के कैद से आजादी मिल गई। यह देखकर लखिया बौखला गई। उसे नीरजा का यह प्रयास अपने लिए एक चुनौती लगा। अब लखिया ने अपनी बिल्ली का सहारा लेना उचित समझा। उसने अपनी बिल्ली के सर के ऊपर जलता हुआ दीपक रखा और अपने मंत्र का प्रयोग करने लगी।

 

 

 

 

 

नीरजा तो पहले से ही तैयार थी। उसने अपने पास रखे हुए एक चूहे को बिल्ली के सामने किया और अपने मंत्र का प्रयोग करने लगी। चूहे को सामने देखकर बिल्ली उसके ऊपर झपट पड़ी फलतः जलता हुआ दीपक नीचे गिर गया और लखिया का जादू अपूर्ण हो गया।

 

 

 

 

 

लखिया ने दूसरा प्रयास किया -नीरजा ने भी दूसरी बार चूहे को बिल्ली के सामने छोड़ दिया। बिल्ली छुए पर झपटी, इसी प्रयास में बिल्ली के सर से जलाता हुआ दीपक पुनः गिर गया और फिर लखिया का जादू अपूर्ण रह गया।

 

 

 

 

 

फिर लखिया ने तीसरा प्रयास किया लेकिन वह प्रयास भी नीरजा ने अपने चूहे के द्वारा असफल कर दिया और फिर नीरजा अपने जादुई शक्ति से बचे हुए पशु-पक्षियों को मनुष्य रूप में परिवर्तित कर दिया। यह देखकर लखिया का क्रोध सातवे आसमान पर पहुंच चुका था।

 

 

 

 

 

 

अब उसका दिवस खत्म होने वाला था और अँधेरे के आगमन की शरुवात हो चुकी थी। उसे अपनी हार तय लग रही थी क्योंकि उसकी बिल्ली चूहे को पकड़ने के लिए उतावली रहती फलतः उसके सर से जलता हुआ दीपक गिर जाता था। जिस कारण लखिया को हानि उठानी पड़ रही थी।

 

 

 

 

 

चौथी बार लखिया ने जोरदार हमला बोला, लेकिन नीरजा के चूहे के सामने उसकी एक न चली। उसकी बिल्ली के सर के ऊपर से जलता हुआ दीपक पुनः एक बार गिर गया और लखिया एक बार फिर हार गई। इसी गुस्से को उसने बिल्ली के ऊपर निकाला परिणाम स्वरूप बिल्ली का जीवन दीप बुझ चुका था।

 

 

 

 

 

अब लखिया संपूर्ण रूप से हार चुकी थी। उसके जादू का वर्चस्व समाप्त हो चुका था। उसने नीरजा के समक्ष अपनी हार को स्वीकार कर लिया था। लखिया ने वह पिंजरा जिसमे राजकुमार को कैद किया था, तोते के रूप में नीरजा को दे दिया।

 

 

 

 

 

नीरजा ने तोते के गर्दन से  उसके जादू के प्रभाव को समाप्त कर दिया और सामने राजकुमार हरेंद्र खड़ा था। नीरजा ने लखिया को माफ़ कर दिया और सामान्य प्राणियों की तरह जीवन यापन का आदेश देकर अपने राज्य मनोहर पुर में राजकुमार हरेंद्र के साथ लौट आई।

 

 

 

गोसाईपुर ( बदलाव की एक कहानी ) Short Stories For Children in Hindi )

 

 

 

Hindi Short Stories

 

 

 

18- गोसाई पुर गांव में पुरुषोत्तम दादा अपनी पत्नी सुखिया के साथ जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके चार लड़के थे। लड़कों का नाम  था, मूरत, सूरत, कीरत और हरेंद्र। पुरुषोत्तम दादा का नाम पुरुषोत्तम था, लेकिन गांव के लोग उन्हें पुरुषोत्तम दादा ही कहते थे।

 

 

 

 

 

मूरत पुरुषोत्तम दादा का बड़ा लड़का था। दादा की माली हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए मूरत को किसी ने भी अपनी कन्या का हाथ नहीं दिया। जिस कारण मूरत आजीवन कुंवारे ही थे।

 

 

 

 

 

पुरुषोत्तम दादा का दूसरा लड़का सूरत कानपुर में जाकर एक रिश्तेदार के यहां कपाट बनाने के कारखाने में काम करने लगा। कपाट बनाने के कार्य में निपुण होने के पश्चात थोड़ा रिश्तदार के साथ बेईमानी करके और थोड़ा परिश्रम के बल पर नामी गिरामी सेठ बन गया।

 

 

 

 

 

तीसरा लड़का कीरत के ऊपर भगवान की कृपा थी। उसकी शादी हो गयी और उसके ससुराल में संभालने वाला कोई नहीं था। इसलिए वह अपने ससुराल में ही स्थापित हो गया।

 

 

 

 

 

हरेंद्र पुरुषोत्तम दादा का चौथा लड़का था। वह मुंबई में बस का कंडक्टर था, उसी से उसकी जीविका चलती थी। कालांतर में पुरुषोत्तम दादा भगवान को प्यारे हो गए।

 

 

 

 

 

अब सुखिया दादी के सामने जीवन यापन की समस्या थी क्योंकि माली हालत अच्छी नहीं थी और जो थोड़ी बहुत खेती की जमीन थी, उसमे गुजारा के लायक अन्न पैदा नहीं हो पाता, क्योंकि बड़ा लड़का बहुत ही कामचोर था।

 

 

 

 

 

 

 

दूसरा लड़का सूरत अपना व्यवसाय संभालने के साथ ही कानपुर में ही रह गया। वह गांव में बहुत कम आता था, और माँ का ख्याल रखना तो दूर एक पत्र भी नहीं देता था।

 

 

 

 

तीसरा लड़का कीरत भी सूरत से कम न था। उसके ससुराल में इतनी जमीन मिली थी कि वह अपने परिवार में व्यस्त रहने के कारण वह भी अपनी माता का ख्याल नहीं रख पाता था।

 

 

 

 

चौथा लड़का हरेंद्र मुंबई में बस कंडक्टर जरूर था। लेकिन उस समय में इतनी पगार नहीं थी कि वह अपने खर्च को देखते हुए भेज पाता। दो चार महीने में कभी सौदा 200 रुपया मनीऑर्डर भेज देता, लेकिन उतने से क्या होने वाला था।

 

 

 

 

 

वह दौर बहुत ही खराब था। सुखिया दादी को महुआ खाकर दिन गुजारना पड़ता था। हरेंद्र का परिवार बढ़ता ही गया। उनके तीन लड़के थे और एक लड़की। हरेंद्र ने किसी तरह लड़की की शादी कर दिया और वह अपने घर चली गयी।

 

 

 

 

 

 

हरेंद्र के बड़े लड़के का नाम अंकुर था। मझले का नाम पंकज और छोटे का नाम राजू था। अंकुर का मामा बनारस में रहते थे। अंकुर वहीं रहकर B. A. तक की पढ़ाई की फिर एक टी. सी. रेलवे टिकट चेकर की लड़की के साथ शादी हो गई। शादी भी ऐसे गांव में की कि किसी को खबर तक नहीं लगी।

 

 

 

 

 

अंकुर आगे की पढ़ाई करने की तयारी की और अपने पिता हरेंद्र के पास मुंबई आ गया, और मुन्ना भाई वाली स्टाइल में L.L.B. किया और मुंबई में ही कोर्ट प्रैक्टिस करने लगा। वकालत का पेशा ही ऐसा है कि काले को सफ़ेद और सफ़ेद को काला कहना पड़ता है।

 

 

 

 

 

अगर थोड़ा सा साक्ष्य मिल जाय तो अदालत भी सफेद को काला मान लेती है, क्योंकि कानून अंधा होता है। इसलिए जो हाथ में तराजू लिए जो पुतला खड़ा रहता है उसकी आखों में सदैव ही काली पट्टी बंधी रहती है। इसलिए ही झूठी दलीलों पर गौर किया जाता है और सच्चाई से मुंह मोड़ लिया जाता है।

 

 

 

 

 

धीरे-धीरे अंकुर को भी इस पेशे में जिसमे झूठ को सही और सही को झूठ बनाया जाता है मजा आने लगा और उसने भी इस काम में महारथ हासिल कर ली। किसी भी शहर में अपराध और अपराधी दोनों होते है और उसकी जितनी पहुंच होती है उसके पास लक्ष्मी का उतना ही आवागमन होता है।

 

 

 

 

 

अपनी उसी वकालत की कला के भरोसे अंकुर ने मुंबई जैसे महंगे शहर में करोड़ो की प्रापर्टी बना ली थी। इसने यहां भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। सब प्रापर्टी अपनी श्रीमती जी के नाम कर रखा था।

 

 

 

 

 

अगर ऐसा नहीं करता तो भाइयों को प्रापर्टी में हिस्सा देना पड़ता ( यह सब मात्र तीन वर्षों के भीतर किया, अधिकतर वकीलों की जिंदगी गुजर जाती है इतनी प्रापर्टी बनाने में ) अब अंकुर का रुख गांव की तरफ था।

 

 

 

 

 

 

उसने अपने बड़े पिता की जमीन भी अपनी श्रीमती के नाम करा लिया और गांव में अकारण ही हर किसी से बिना वजह ही दुश्मनी बढ़ाने लगा, और अंग्रजों के जैसे विस्तार वादी का रवैया अपना लिया।

 

 

 

 

 

अंकुर के लिए पैसा कोई मायने नहीं रखता था। इसलिए उसके आस-पास चाटुकारो की फ़ौज लगी रहती थी। जिस तरह गुड़ के पास ढेर सारे चीटे जमा हो जाते है और गुड़ ढक लेते है।

 

 

 

 

 

 

वही स्थिति अंकुर के साथ थी इसलिए उसे जमीनी हकीकत का पता नहीं चलता और जो उसके चाटुकार कहते थे, उसे ही वह अटल सत्य समझता था। वह अपना प्रभुत्व ज़माने के लिए उन चमचों पर पैसा बहाता था।

 

 

 

 

 

 

 

हर बात की सुध रखने के वाले चतुर पाठक जानते होंगे सदैव से ही समर्थको को दोष नहीं दिया जाता। दोष तो निर्बल, असहाय और सीधे-साधे लोगों पर मढ़ दिया जाता है। शायद इसीलिए तुलसी दास ने लिखा होगा….

 

 

 

समर्थ को नहीं दोष गोसाई। रवि पावक सुरसरि की नाई।। 

 

 

 

अंकुर गांव में बहुत बड़ा मकान बनाने जा रहा था। उसकी जमीन उस मकान के लिए कम पड़ रही थी तो उसने गांव में जाने के रास्ते को ही अपनी प्रापर्टी समझकर हड़प लिया। कोई भी गांव का आदमी विरोध नहीं किया कारण कि उसके पैसे की तपन सभी को महसूस हो रही थी।

 

 

 

 

 

अंकुर किसी को भी जमीन को अपने बाप की बपौती समझकर हड़प लेता अगर सामने वाला विरोध करता उसे पैसे की धमकी देता कहता पैसे ले लो। जबकि उस जमीन का उचित मूल्य भी नहीं देता, थोड़े से पैसों में कीमती जमीन उसकी हो जाती।

 

 

 

 

 

 

अंकुर का घर जहां बन रहा था। उसके बगल की जमीन उसके पड़ोसी की थी, लेकिन उसे हड्डी का स्वाद लग चुका था। उसने बिना पूछे और बिना पैसा दिए ही अपने पड़ोसी की जमीन को हड़पना चाहा। परिणाम स्वरूप पड़ोसियों द्वारा लक्ष्मण रेखा खींच दी गयी।

 

 

 

 

 

 

हाथी के सामने चींटी की औकात तुच्छ है लेकिन चींटी अब हाथी के सूंड में घुस चुकी थी। अब अंकुर रूपी हाथी के सामने ( जीवन-मरण ) का प्रश्न था। यानी इज्जत का सवाल था। पूरे गांव में सन्नाटा था। सभी लोग तमासबीन बने हुए थे।

 

 

 

 

 

 

एक तरफ खरदूषण की सेना थी तो दूसरी तरफ महाराज दशरथ के दो वीर अपने आत्म सम्मान के लिए डटे हुए थे। अगल-बगल के गावों में भी यह बात आग की तरह फ़ैल गयी थी। एक तरफ पैसे से आत्म सम्मान खरीदा जा रहा था और दूसरी तरफ आत्म सम्मान की रक्षा करना था।

 

 

 

 

 

 

अंकुर अपने छोटे भाई को गांव का सारा कार्य देखने के लिए रख छोड़ा था और स्वयं गांव में एक हप्ते के लिए आता था। उसने अपने पैसे के बल पर तहसील से लेकर जिला तक दबदबा बना रखा था।

 

 

 

 

 

 

जिसका उदाहरण वह एक बड़ा भूखंड था। जहां पर उसका अधिपत्य था। अंकुर ने सभी सरकारी कर्मचारियों को अपना गुलाम बना लिया था। ( एकाध कर्मचारी ही अपवाद थे। )

 

 

 

 

 

 

अंकुर ने अपने पैसे से खरीदे चाटुकारों को कार्य पर लगा दिया था, सो दशरथ पुत्रों के सामने चाटुकारों ने सुलह का प्रस्ताव दिया। लेकिन स्वाभिमानी दशरथ पुत्रों को इन चाटुकारों का प्रस्ताव मंजूर नहीं था।

 

 

 

 

 

इसलिए अंकुर को स्वयं आना पड़ा दशरथ के सामने और सुलह का प्रस्ताव मंजूर हुआ और अंकुर ने उस जमीन का हर्जाना दिया, उसके उपरांत ही उसकी हवेली पूर्ण हुई। लेकिन अंकुर इस अपमान को भुला नहीं पाया इसलिए वह अवसर की तलाश में था।

 

 

 

 

 

 

दशरथ का अपने पड़ोसी से बहुत पहले से विवाद था। सांप छछूंदर को निगल तो लेता है ( चूहा समझकर ) लेकिन निगलने के पश्चात ही उसे ज्ञात होता है कि मैंने गलत आहार निगल लिया। लेकिन उसे उगल नहीं पाता क्योंकि उसकी क्षुधा की तृप्ति नहीं हो पाती।

 

 

 

 

 

 

इसलिए दशरथ का पड़ोसी उनकी गफलत का फायदा उठाकर एक तीर से दो निशाने लगाने का प्रयास किया जिसमे वह अल्प अवधि के लिए सफल भी हो गया। दशरथ के पड़ोसी ने हल्की चूक का फायदा उठाया और दशरथ के पुरखों की जमीन अंकुर के नाम रजिस्ट्री कर दिया।

 

 

 

 

 

 

उसने दशरथ को अंकुर से लड़ा दिया यह सोचकर कि अंकुर के सामने दशरथ की औकात ही क्या है, और बात पूर्णतः सत्य भी थी। अंकुर के सामने दशरथ की औकात चींटी के सामान थी। लेकिन अंकुर रूपी हाथी के सूंड में चींटी घुस चुकी थी। जब तक अंकुर को पता चलता तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

 

 

 

 

 

 

अपनी ही जमीन को बचाने के लिए दशरथ के लड़कों ने प्रयास करना शरू किया। अंकुर का छोटा भाई राजू इस समय ग्राम का प्रधान था। गांव के सभी वर्ग के लोग उसे यह सोचकर प्रधान चुना था कि यह बड़ा आदमी है और इसके पास पैसा भी है, तो यह गांव का विकास करेगा।

 

 

 

 

 

लेकिन पैसों वालों की भूख पैसे के लिए और बढ़ती जाती है। राजू प्रधान ने भी वैसा ही किया। पोखरे की मिट्टी और पेड़ अवैध रूप से बेच दिया, जिस तरह पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करना महंगा पड़ता है, ठीक यही स्थिति बन गयी थी।

 

 

 

 

 

 

दशरथ के लड़कों ने मौके को भुना लिया और प्रधान के ऊपर केश हो गयी। प्रधान के ऊपर जांच बैठा दी गई, जांच में प्रधान के ऊपर सभी आरोप सत्य पाए गए।

 

 

 

 

 

 

जांच अधिकारी ने दशरथ पुत्रों से पूछा, “आप लोग क्या चाहते है ?”

 

 

दशरथ के लड़के बोले, “इसमें किस सजा का प्रावधान है ?”

 

 

 

 

“राजू की प्रधानी जा सकती है और जेल भी हो सकती है।” जांच अधिकारी ने कहा।

 

 

 

“प्रधान ने सबके सामने अपनी गलती को स्वीकारा है। इसलिए इसे एक अवसर मिलना चाहिए।” दशरथ के लड़कों ने कहा।

 

 

 

 

 

 

 

जांच अधिकारी हल्का सा जुर्माना लगाकर प्रधान को दुबारा गलती न करने के अश्वासन पर छोड़ दिया। ऐसी तमाम घटनाए हुई जिससे अंकुर तिलमिला उठा। लोगों ने कहना भी शरू कर दिया कि अंकुर के अश्वमेध का घोड़ा दशरथ के लड़कों ने रोक दिया।

 

 

 

 

 

अपनी ही जमीन को बचाने का प्रयास कर रहे दशरथ के लड़कों ने जिला मुख्यालय में दिवानी का मुकदमा कर दिया। अंकुर के घर सम्मन आया उसके नौकर ने सम्मन लिया। वह सम्मन अंकुर के गाल पर करारा तमाचा था। जिससे उसके चेहरे पर अँगुलियों के निशान स्पष्ट रूप से थे।

 

 

 

 

 

 

दोनों पक्षों की तरफ से साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग स्पष्ट रूप से देखा जा रहा था। हर गली और बाजार में यहां तक कि तहसील स्तर पर भी खूब चर्चा हो रही थी। मुकदमे की तारीख पड़ी हुई थी, तहसील में S. D. M. के सामने दशरथ बनाम अंकुर की फ़ाइल पहुंच गई थी।

 

 

 

 

 

 

अंकुर का प्रयास था कि मुकदमे को जितना लम्बा खींचा जाएगा उतनी ही विपक्ष की ताकत कमजोर पड़ेगी। उसे अपने पैसे पर पूर्ण रूपेण भरोसा था। दशरथ के दोनों लड़कों का नाम जयेन्द्र और विजेंद्र था। उन लोगों का प्रयास था कि जल्दी से फैसला होना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

S. D. M. ने जयेन्द्र को अपने ऑफिस में बुलाया और कहा, “जयेन्द्र आप इतने बड़े आदमी से भिड़ गए इसका क्या परिणाम होगा पता है आपको ?” जयेन्द्र ने कहा, “परिणाम चाहे जो भी हो उन लोगों को भी एहसास होना चाहिए। आप उन लोगों को एहसास कराएगे क्या ?”

 

 

 

 

 

जयेन्द्र ने S. D. M. से फिर कहा, “आप बातों को मत उलझाइए फ़ाइल की कारवाई के लिए जिला प्रमुख के पास भेजिए, नहीं तो हमें आगे जाना पड़ेगा।” S. D. M. ने कहा, “आप प्रयास करके देख लीजिए।”

 

 

 

 

 

 

जयेन्द्र का प्रयास रंग लाया हाईकोर्ट से तहसील मुख्यालय पर S. D. M. के नाम पर सम्मन आया। पूरे वकीलों के मध्य यह चर्चा का विषय बन गया क्योंकि वकीलों की तमाम प्रयास के बाद भी S. D. M. का तबादला नहीं हो पाया था। उसी S. D. M. को हाईकोर्ट से सम्मन आ गया।

 

 

 

 

 

 

अब तो जयेन्द्र एक चर्चित चेहरा हो चुका था। दशरथ के दो पुत्र और थे जो नेपथ्य में रहकर सहायता कर रहे थे। पूरा परिवार अंकुर के खिलाफ था और एकजुट होकर खड़ा था।

 

 

 

 

 

 

एक दिन S. D. M. ने अपने क़्वार्टर पर राजू प्रधान और जयेन्द्र दोनों को बुलाया और राजू प्रधान जो अंकुर का प्रतिनिधि था, उससे कहा, “अगर आप बीस है तो जयेन्द्र भी उन्नीस है। उन्नीस और बीस में एक अंक का फर्क है। पासा कभी भी पलट सकता है। हमारे विचार से आप जयेन्द्र से सुलह कर लीजिए। जिसने हमारे जैसे S.D.M. को हाईकोर्ट तक की दौड़ लगवा दी, उसे आप कमतर मत आंकिए।”

 

 

 

 

 

 

 

S.D.M. को जयेन्द्र के कौशल का पता चल चुका था। उसने अपना तबादला कहीं अन्यत्र करा लिया था। मुकदमा अब हाईकोर्ट ( उच्च न्यायालय ) में चल रहा था। यह बात चारो तरफ चर्चा का विषय बन चुकी थी। जयेन्द्र का हर जगह नाम हो चुका था। लोग जयेन्द्र से सलाह मशविरे के लिए आते थे।

 

 

 

 

 

जिस बड़े भूखंड को अंकुर ने D.M. के द्वारा अवैध रूप से कब्ज़ा कर रखा था। उस D.M. को भी इस मुकदमे के बारे में अंकुर ने बताया था। D.M. को भी आभास हो चुका था कि जो मुकदमा उच्च न्यायालय में जा सकता है। वह मुकदमा कभी भी उच्चतम न्यायालय भी जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

जिसमे D.M. का फसना भी तय था। इसलिए उन्होंने अंकुर को एक मात्र सुलह की उपाय बताये और चलते बने। मुकदमे की गंभीरता को देखते हुए अंकुर को अपनी हार तय लग रही थी और उसका फार्मूला उस पर ही भरी पड़ रहा था। ( हर चीज को पैसे से खरीदना अंकुर का फार्मूला था ) ।

 

 

 

 

 

 

उसका बहुत ही पैसा बर्बाद हुआ था। इसलिए उसने दूसरे गांव के सम्मानित लोगों द्वारा प्रयास करना शुरू किया। सम्मानित लोगों ने जयेन्द्र को समझाना शुरू किया। इतने बड़े आदमी के सम्मान का हवाला दिया, हमारे आत्मसम्मान को अंकुर द्वारा ठोकर मारी गयी है। अतः इसका फैसला न्यायालय द्वारा ही होगा। जयेंद्र का यही वाक्य सुनकर कथित सम्मानित की बोलती बंद हो जाती।

 

 

 

 

 

 

 

 

जयेन्द्र को उनकी माता जी बहुत साहस देती थी और एक बहुत ही अच्छे इंसान की मदद मिली, जो बहुत बड़े मुक़दमे बाज थे। उन्होंने ही जयेन्द्र को कानून की वारीक़िया सिखाई और साहस दिया कि विजय सत्य की ही होगी। जिसका थोड़ा-थोड़ा आभास होना शुरू हो चुका था।

 

 

 

 

 

 

 

जयेन्द्र ने लोगों से कह रखा था कि आत्मसम्मान की कीमत पर समझौता नहीं होगा। एक बहुत ही सम्मानित व्यक्ति थे। उनका नाम था राघव, उन्होंने जयेन्द्र से पूछा, “किस आत्मसम्मान पर समझौता करेंगे ?”

 

 

 

 

 

जयेन्द्र ने राघव से कहा, “हमारे ऊपर से सभी जाली मुकदमे वापस लेने होंगे और जिस जमीन को हमारे पड़ोसी ने रजिस्ट्री की है उसके बगल की जमीन दशरथ की है। यह बात अंकुर को प्रमाणित करनी होगी कोर्ट में, तभी समझौता संभव है अन्यथा नहीं। अगर ऐसा नहीं होगा तो आप भी दुबारा हमारे पास आने की कोशिस नहीं करना।”

 

 

 

 

 

 

जयेन्द्र की ऐसी स्पष्ट बातें सुनकर राघव बहुत ही प्रभावित हुआ। राघव ने अंकुर से कहा, “क्या अपन इतनी छोटी सी बात को इतना लंबा खींच रहे है।”

 

 

 

 

अंकुर ने कहा लोग कहेंगे कि जयेन्द्र ने अंकुर को झुका दिया। लोगों का काम ही है कहना, थोड़ी सी बात पूर्ण करने पर आपकी इतनी बड़ी प्रापर्टी बच जाएगी। बाकी परिणाम आप देख ही रहे है। जो आदमी हाईकोर्ट तक पहुंच सकता है वह सुप्रीम कोर्ट में नहीं जायेगा इसकी क्या गारंटी है ?

 

 

 

 

 

यह बात अंकुर को जम गयी। जयेन्द्र की कही हुई बातों पर ही समझौता हुआ चारो तरफ जयेन्द्र की चर्चा थी। दशरथ के पड़ोसी के हाथ से जमीन भी चली गई और उसे पूरा पैसा भी नहीं मिला। अंकुर ने आज तक पूरा पैसा किसी को भी नहीं दिया था।

 

 

 

 

 

अंकुर के ऊपर से सभी का विश्वास डिग गया और वह समाज में उपहास का पात्र बन गया। ताकत और पैसों की धौंस से किसी को परेशान नहीं करना चाहिए।

 

 

 

लाल केतकी ( एक दिलचस्प जादुई कहानी ) Hindi Short Moral Stories

 

 

 

Hindi Short Stories

 

 

 

 

18- किशनगढ़ की रियासत के राजा कृपाल थे। उनकी लड़की का नाम शीतल था। वह बहुत ही बुद्धिमान थी और खूसूरत भी। एक दिन वह अपने सहेलियों के साथ नदी में स्नान करने के लिए जा रही थी। नदी की तरफ का रास्ता एक बगीचे से होकर जाता था। बगीचे में एक पेड़ पर चकवा चकवी नामक दो पक्षी आपस में बातें कर रहे थे।

 

 

 

 

 

 

चकवी ने कहा, “उधर देखो आज राजा की लड़की अपने सहेलियों के मध्य में कितनी खूबसूरत लग रही है। जैसे तारों के मध्य चन्द्रमा।”

 

 

 

इस पर चकवे ने चकवी से कहा, “तुम ठीक कह रही हो, लेकिन इसके सिर में गजरा है। उसमे अगर एक लाल होता तो इसकी सुंदरता और बढ़ जाती।”

 

 

 

इस बातों को राजा की लड़की ने सुन लिया स्नान से लौटने के बाद राजभवन पहुंची और उसने भोजन करना बंद कर दिया। रानी ने राजकुमारी से पूछा, “क्या बात है ?”

 

 

 

 

राजकुमारी ने कहा, “जब तक हमें लाल नहीं मिलेगा मैं अन्न ग्रहण नहीं करुँगी।” रानी ने राजा को यह बात बताई।

 

 

 

 

राजा ने अपने राज्य में ढिंढोरा करवा दिया जो आदमी हमें लाल लाकर देगा उसे मैं अपना आधा राज्य दे दूंगा। राजदरबार लगा हुआ था। तभी राजा का नाई दौड़ता हुआ आया राजा ने पूछा क्या बात है। इतना उतावलापन क्युं दिखा रहे हो ?

 

 

 

 

नाई ने राजा से कहा, “हमारे राज्य में जो लाला रहता है। उसी के यहाँ लाल मिल सकता है। राजा ने आदेश दिया कि तुरंत लाला को राजदरबार में उपस्थित करो।

 

 

 

 

 

नाई लाला के यहाँ गया और उसे अपने साथ लेकर थोड़ी ही देर में  राजा के सामने राजदरबार में उपस्थित हो गया। राजा ने लाला से पूछा, “क्या तुम्हारे पास लाल है ?”

 

 

 

 

 

लाला ने कहा, ” हमारे पास लाल नहीं है।लेकिन आप हमें एक महीने का समय और एक महीने की खाद्य सामग्री के साथ एक नाव की व्यवस्था करवा दे तो मैं लाल ढूंढने की चेष्टा अवश्य करुंगा।”

 

 

 

 

चेष्टा नहीं हमारे सामने लाल ढूंढकर लाना ही होगा क्योकि यह राजकुमारी के जीवन मरण का प्रश्न है अन्यथा नहीं मिलने पर तुम्हारी भी जान जा सकती है। राजा ने लाला से कहा

 

 

 

 

 

 

लाला अपने घर आया। समय गुजरता जा रहा था और गुजरते समय के साथ -साथ लाला की व्यग्रता भी बढती जा रही थी। जिससे उसे अपनी जान खतरे में पड़ती हुई लग रही थी। अकस्मात लाला का भांजा रवीश उसके घर आया और अपने मामा को उधेड़ बन में पड़ा देखकर पूछा।

 

 

 

 

 

लाला ने रवीश को सारी बात बताई। सारी बातें ज्ञात होने पर उसने लाल लाने के प्रयास करने की बात कही।और एक महीने की खाद्य सामाग्री और एक छोटी सी नाव लेकर नदी के मार्ग से प्रस्थान कर गया। थोड़ी दूर चलने के बाद विपरीत दिशा से लाल बहता हुआ आ रहा था।रवीश के खुशी का ठिकाना ही नहीं था। क्योकि उसका प्रयोजन पूर्ण हो चुका था।

 

 

 

 

 

लेकिन उसने लाल के श्रोत का पता लगाना उचित समझा उसने लाल को अपने पास रखकर अपनी यात्रा को जारी रखा। तभी दूसरा लाल आता हुआ दिखा उसने उसे भी अपने पास रखा यह क्रम लाल के श्रोत तक पहुँचने तक चलता रहा।

 

 

 

 

 

 

 

फलतः उसके पास लाल पर्याप्त मात्रा में हो चुके थे। अंततः उसने नाव को थोड़ा दूर रोककर उस श्रोत के नजदीक पहुंचा तो उसने जो दृश्य देखा उससे उसके रोंगटे खड़े हो गए। एक लड़की का पुतला पेड़ पर टंगा हुआ था। उसके हाथ में एक छड़ी थी। छड़ी से ओस के बूंदो के जैसा पानी नदी में टपक रहा था और उसी से ही लाल का निर्माण हो रहा था।

 

 

 

 

 

 

रवीश कौतुहल वश उस पेड़ पर चढ़ गया। जिज्ञासा वश रवीश  उस पुतले को देखने लगा। उसके हाथ में वह लकड़ी सामान्य लग रही थी। रवीश ने पुतले को हिलाया सहसा उसका हाथ उस छड़ी से टकरा गया और वह पुतला एक सुंदर लड़की के रूप में परिवर्तित हो गया।

 

 

 

 

 

 

लड़की आश्चर्य से रवीश को देखने लगी। थोड़ी देर में उसने रवीश को जू बनाकर अपने सर में रख लिया और खुद पहले वाली अवस्था में हो गई।उसके कुछ ही समय पश्चात् वहां एक विशाल दानव का आगमन हुआ,आते ही उसने सूक्ष्मता से निरिक्षण किया फिर उस लड़की को जिलाया, और छी मानुष – छी मानुष कहकर  जोर -जोर चिल्लाने लगा। यहाँ पर मनुष्य की उपस्थित प्रतीत होती है। कौन आया है यहाँ ? वार्तालाप से मालूम हुआ कि वह दानव लड़की का पिता था।

 

 

 

 

लड़की ने कहा, “यहाँ पर मैं और आप दो ही है। आपको मनुष्य की गंध आ रही है तो मुझे ही खा जाइए यहाँ कोई दूसरा मनुष्य तो नहीं है।”

 

 

 

 

 

कोई अपनी संतान को मार कर खाता है क्या ? दानव ने कहा  यहाँ पर मनुष्य नहीं आना चाहिए और दानव अपनी भोजन की तलाश में चला गया। उसके बाद लड़की ने अपने सर से जू को निकाला और उसे आदमी में परिवर्तित कर दिया।

 

 

 

 

 

 

 

उसने रवीश से पूछा, “तुम यहाँ क्यों आए हो ?” रवीश ने पूरा वृतांत कह सुनाया।

 

 

 

 

लड़की ने कहा, “इसके लिए तुम्हे हमारे पिता से हमारा हाथ मांगना होगा। जिसके लिए वह शायद ही राजी हो।”

 

 

 

 

 

इस पर रवीश ने लड़की से कहा, “तुम्ही कोई उपाय बताओ ” ठीक है। मैं ही कोई उपाय सोचती हूँ। दानव के आने का समय हो रहा था उसे दो किलोमीटर से ही मनुष्य के गंध को पहचानने की क्षमता थी। लड़की को आभास हो चुका था, कि उसका पिता आने वाला है। उसने रवीश को जू  बनाकर अपने सर में छुपा लिया।

 

 

 

 

 

 

दानव आते ही छी मानुस – छी मानुस चिल्लाने लगा। दानव ने कहा, “यहाँ मनुष्य की गंध कहां से आ रही है।” यहाँ सिर्फ मैं ही मनुष्य हूँ आप मुझे ही खा जाओ।”

 

 

 

 

दानव ने कहा, “कोई अपनी संतान को खाता है क्या ? यह कहकर दानव शांत हो गया।”

 

 

 

लड़की ने दानव से कहा, “मैं आप के जाने के बाद यहाँ बैठे – बैठे उकता जाती हूँ। क्या मतलब, दानव ने पूछा।

 

 

फिर लड़की ने कहा, “आप हमारा विवाह क्यूँ नहीं कर देते।

 

 

यह बात सुनकर दानव ने कहा, “मैं कोई सुन्दर लड़का देखता हूँ तो उसे मारकर खा जाता हूँ।”

 

 

 

लड़की ने कहा, “अगर मैं कही से लड़का ढूंढकर लाऊँ तो आप हमारा विवाह उससे कर दोगे।” अवश्य ही कर दूंगा। लेकिन पहले वचन दीजिए कि मेरे द्वारा ढूंढे गए लड़के को आप नहीं खाओगे।लड़की ने कहा।

 

 

 

 

 

 

दूसरे दिन दानव अपने भोजन की तलाश में चला गया तो लड़की ने अपने सर से जू को निकाला और उसे आदमी में परिवर्तित कर उसके साथ खेलने लगी। दानव जब लौटकर आया और एक अजनबी को देखकर खाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो लड़की ने दानव को अपना वचन याद दिलाया।

 

 

 

 

 

दानव को अपना वचन याद आते ही रुकना पड़ा। और अपने लड़की की शादी उस लड़के रवीश के साथ कर दी। कुछ समय के उपरांत रवीश ने दानव से जाने की इच्छा प्रकट की।

 

 

 

 

 

दानव ने खुशी – खुशी दोनों को बिदा किया और कहा, “कभी आवश्यकता पड़े तो हमें सूचित करना। रवीश अपनी पत्नी के साथ नाव के द्वारा अपने राज्य में वापस आ गया। आते ही अपने मामा लाला को पूरी बात से अवगत कराया।

 

 

 

 

 

रात्रि के समय रवीश  ने कविता से कहा, “मुझे लाल की आवश्यकता है।” कविता ने रवीश को अपनी छड़ी देते हुए कहा, “तुम इस छड़ी को मेरे उपर तीन बार घुमाओ, मैं पुतले में परिवर्तित हो जाऊँगी। उसके बाद छड़ी हमारे हाथ में दे देना और छड़ी के निचे पानी रख देना ततपश्चात मेरा कार्य शुरू हो जाएगा जिससे तुम्हे लाल प्राप्त हो जाएगा। उसके बाद जैसे ही तुम उस छड़ी को अपने हाथ से स्पर्श करोगे मैं लड़की में परिवर्तित हो जाऊँगी।”

 

 

 

 

 

 

रवीश ने कविता के कहे हुए शब्द के अनुसार वैसा ही किया जिससे उसे बहुत सारे लाल की प्राप्ति हुई। दूसरे दिन रवीश ने उस लाल को अपने मामा को दिया और लाला ने वह लाल लेकर राजा के दरबार में उपस्थित हुआ। उसके बाद लाल राजा को दिया। राजा की लड़की अपने सहेलियों के साथ गजरे में लाल लगाए हुए नदी स्नान के लिए जा रही थी।

 

 

 

 

 

 

 

राजा की लड़की को देखकर चकवी ने चकवे से पुनः कहा, “आज राजा के लड़की की सुंदरता में चार चाँद लग गए।”

 

 

चकवे ने चकवी से कहा, “ये क्या बात है यह तो कुछ नहीं है अगर लाल के बीच – बीच में केतकी का फूल होता तो इसकी सुंदरता दोगुनी हो जाती ?”

 

 

 

स्नान से लौटने के बाद लड़की  पुनः उदास हो गई। राजा ने लड़की  से उसके उदासी का कारण पूछा।

 

 

लड़की ने कहा, “मुझे केतकी का फूल चाहिए अन्यथा मैं नदी स्नान को नहीं जाउंगी।”

 

 

 

 

राजा ने यह बात नाई को बताईतो नाई ने राजा से कहा, “जिस लाला ने लाल लेकर दिया है वही केतकी का फूल भी लाकर देगा।”

 

 

राजा ने लाला को राजदरबार में बुलाया और केतकी का फूल लाने की इच्छा प्रकट की। लाला ने चार महीने की खाद्य सामाग्री और एक नाव का प्रबंध करने के लिए राजा से कहा। राजा ने सारी चीजों की व्यवस्था करवा दी।

 

 

 

 

 

लाला घर आने बाद उदास हो गया रवीश ने उसके उदासी का कारण पूछा, “राजा ने पहले लाल मंगवाया अब वह केतकी के फूल की इच्छा प्रकट की हैं। लेकिन केतकी का फूल कहाँ मिलेगा ? यही हमारी परेशानी का कारण है।

 

 

 

 

 

यह बात रवीश के औरत कविता को पता चली तो उसने रवीश से कहा, “केतकी का फूल मिल जाएगा। यहाँ से सात सौ किलोमीटर दूर हमारे पिता दानव राज का मित्र महादानव रहता है। उसकी पुत्री का नाम सविता है। उसे चौरस का खेल बहुत पसंद है। अगर उसे उस खेल में जो हंसा देगा तो उसके हंसने के साथ ही उसके मुख से ढेर सारे केतकी के फूलों की वर्षा होती है। लेकिन उसे हँसाना ही असंभव है।”

 

 

 

 

 

 

रवीश ने अपनी पत्नी से कहा, “इस कार्य को करने में तुम हमारी सहायता करो।”

 

 

 

कविता ने कहा, “ठीक है मैं तुम्हे एक पत्र देती हूँ तुम उस पत्र को वहां लेकर जाओ।”

 

 

 

 

 

रवीश ने पत्र लिया और नाव के द्वारा नदी में प्रस्थान किया। एक सप्ताह चलने के उपरांत वह उस जगह पहुंचा जहाँ उस दानव का निवास था। वहां उसने एक लड़की को देखा जिसके शरीर से केतकी के फूल की सुगंध आ रही थी। उसका नाम सविता था। रवीश ने नाव को थोड़ी दूर पर रोका और उसकी तरफ रवाना हुआ। लड़की अपने सामने रवीश को देखकर चौंक गई, क्योकि वहां मनुष्य का आना वर्जित था।

 

 

 

 

 

 

 

रवीश ने अपनी पत्नी का लिखा हुआ सविता को दिया। सविता ने कविता का लिखा हुआ पत्र पढ़ा और उसे जू बनाकर अपने सर में छिपा लिया, क्योकि महादानव को वहां पर मानव का आभास हो चुका था जिस कारण वह दौड़ते हुए आ रहा था, और आते ही उसने छी मानुस – छी मानुस की रट लगा दी। उसने सविता से गुस्से से पूछा, “यहाँ कौन सा मनुष्य आया है ?”

 

 

 

 

 

 

यहाँ सिर्फ मैं ही एक मनुष्य हूँ आप मुझे ही खा जाओ सविता ने दानवराज से कहा। मैं तुम्हे कैसे खा जाऊं  तुम तो हमारी अपनी संतान हो दानव ने कहा।

 

 

 

 

 

इसी तरह दिन बीतते गए अचानक रवीश को अपने आने का प्रयोजन याद आया। रवीश ने सविता से कहा, “अब हमें चलना चाहिए”

 

 

 

 

इस पर सविता ने रवीश से कहा, “हमें चलने से पहले महादानव की आज्ञा लेनी पड़ेगी अन्यथा वह हम दोनों को खा जाएगा।” महादानव के आने का समय हो चुका थ। सविता ने पुनः रवीश को जू  बनाकर अपने सर में छुपा लिया।

 

 

 

 

 

 

सविता ने महादानव से कहा, “मुझे यहाँ अकेले में बहुत परेशानी होती है आप हमारी शादी क्यूँ नहीं कर देते ?” मैं कोई सुन्दर लड़का देखता हूँ तो उसे खाने के लिए अपना लोभ संवरण नहीं कर पाता हूँ। दानवराज ने सविता से कहा।

 

 

 

 

 

 

महादानव की बात सुनकर सविता ने कहा, “अगर मै कोई लड़का उपस्थित करुंगी तो क्या आप मेरी शादी उससे कर देंगे।” अवश्य महादानव ने कहा।

 

 

 

 

 

 

लड़की ने पुनः कहा, “पहले आप मुझे वचन दो कि आप उसे नही खाओगे।” ठीक है  वचन देता हूँ नहीं खाऊंगा महादानव  कहा।

 

 

 

 

 

 

दूसरे दिन सविता ने रवीश को महादानव के सामने प्रस्तुत किया। रवीश को देखते ही महादानव ने उसे खाने के लिए दौड़ा तभी सविता ने उसे उसका वचन याद दिलाया तो वह रुक गया। फिर उसने दोनों की शादी कर दी।

 

 

 

 

 

 

 

कुछ दिन के बाद रवीश ने सविता से कहा, “अब हमें यहाँ से चलना चाहिए, उसने महादानव से आज्ञा मांगी।” महादानव ने रवीश से कहा, ” यह मेरी इकलौती संतान है और मैंने इसे बड़े ही अच्छे से पाला है। यह तुम्हारे साथ जा रही है। अगर कोई भी मुसीबत पड़े तो हमें याद करना।” दोनों सुखी पूर्वक अपने घर को लौट आए।

 

 

 

 

 

 

रात्रि के समय कविता सविता और रवीश अक्सर ही चौरस खेलते थे। रवीश और कविता के अथक प्रयास के बाद भी सविता को हंसी नहीं आती थी। चार महीने में चार दिन शेष थे। लाला को केतकी का फूल लेकर राजदबार होना था।

 

 

 

 

 

 

एक दिन रात्रि के समय कविता सविता और रवीश चौरस खेल रहे थे, अचानक सविता को अपने पिछले दिनों के घटनाक्रम की याद आ गई और उसके मुख से हंसी छूट पड़ी। उसके हँसते ही केतकी के फूलों की बरसात होने लगी। यह देखकर रवीश और कविता बहुत उत्साहित हुए और उन्होंने फूलों को इकट्ठा किया। और उन दोनों ने फूलों को अपने मामा को दे दिया।

 

 

 

 

 

 

चार महीने पूर्ण होने के दो दिन पहले ही लाला केतकी का फूल लेकर राजदरबार में उपस्थित हो गया। और वह फूल राजा के लड़की को दे दिया। राजा की लड़की केतकी के फूल देखकर बाहत प्रसन्न हुई। जब वह अपने सहेलियों के साथ अपने गजरे में लाल और केतकी के फूल  लगाकर नदी स्नान के लिए गई।

 

 

 

 

 

चकवी ने चकवे से कहा, “देखो आज राजा की लड़की कितनी सुन्दर दिख रही है।” चकवे ने राजा के लड़की को देखते हुए कहा, “सचमुच यह सुंदर से सुंदरतम है। आज यह पारी के जैसा दिख रही है।”

 

 

 

 

 

 

राजा की लड़की अपनी प्रसंशा में कहे गए शब्द को सुनकर बहुत ही खुश हुई। लड़की को खुश देखकर राजा बहुत खुश हुए। दूसरे दिन लाला दरबार में उपस्थित होकर राजा को अपने वचनो को याद दिलाया। फलस्वरूप राजा ने अपनी लड़की की शादी के साथ – साथ अपने राज्य का आधा राज्य भी रवीश को दे दिया। रवीश अपने तीनो पत्नियों के साथ -साथ अपने मामा को लेकर खुशी – ख़ुशी जीवन यापन करने लगा।

 

 

मेहनत का पर्याय नहीं 

 

 

19- मनोज नाम का एक किसान था। वह बहुत मेहनत से अपनी खेती करता था। चाहे आंधी हो या तूफान ठंडी हो या गर्मी मनोज सदा ही एकरस बना रहता था।

 

 

 

 

यानी कि सदा ही मेहनत से हर काम को अंजाम देता था। मनोज की गेहूं की फसल पककर तैयार हो गई थी। फसल काटने का समय आ गया था।

 

 

 

 

मनोज ने अपने परिवार को साथ लिया और फसल की कटाई में जुट गया। उसे फसल काटते देखकर मोहन ने कहा, “आप हर काम में हमेशा जल्दबाजी करते है। दो दिन के बाद ही फसल कटाई करना चाहिए था।”

 

 

 

 

मनोज कहने लगा, “फसल जब पक गई है तो देर करना उचित नहीं है क्योंकि मौसम कभी भी करवट ले सकता है। इसलिए हमे इस अवसर को छोड़ना मंहगा पड़ सकता है और सारी मेहनत के साथ पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।”

 

 

 

 

मनोज ने अपनी पकी हुई फसल काटकर घर लाया फिर मौसम में परिवर्तन होने लगा। बूंदा बांदी के साथ ही जोरदार बरसात हो गई। कई किसानो की तैयार फसल खराब हो गई थी।

 

 

 

 

जबकि मोहन ने अवसर का लाभ उठाया और मेहनत के बल पर फसल को बर्बाद होने से बचा लिया था।

 

 

 

 

मित्रों यह Hindi short Stories आपको कैसी लगी जरूर बताएं और Hindi Short Stories Written  की तरह की दूसरी कहानी के लिए इस ब्लॉग को सब्स्क्राइब जरूर करें और Hindi Short Stories Writing की तरह की दूसरी कहानी नीचे की लिंक पर क्लिक करें।

 

 

 

 

1- 5+Stories in Hindi To Read / जीने की चाह हिंदी कहानी जरूर पढ़ें

 

2- 13 Moral Stories in Hindi With Moral / शिक्षाप्रद 13 हिंदी कहानियां जरूर पढ़ें

 

3- Short Moral Stories in Hindi For Class 1, 2 / 3 बच्चों की शिक्षाप्रद कहानियां

 

4- Short Moral Stories in Hindi for Class 8 / बहुत ही सुन्दर कहानी हिंदी में

 

5- Panchatantra Short Stories in Hindi with Moral

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!