Hindi Story for Kids Pdf / सही दिशा हिंदी की 3 शिक्षाप्रद कहानियां जरूर पढ़ें

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Hindi Story for Kids मित्रों इस पोस्ट में Hindi Story for Kids With Moral  दी गयी है।  सभी हिंदी स्टोरी फॉर किड्स इन हिंदी बहुत ही शिक्षाप्रद और मनोरंजक है। 

 

 

 

 

Hindi Story for Kids ( सही दिशा )

 

 

 

 

१- एक हट्टा – कट्टा पहलवान एक रेलवे स्टेशन पर उतरा।  वह टैक्सी स्टैंड पर आया और बोला, ”  मुझे हनुमान मंदिर जाना है।  कितने पैसे होंगे ? ”        

 

 

 

 

टैक्सी वाले ने कहा, ” २०० रुपये लगेंगे।  ” उस पहलवान ने कहा, ” मंदिर तो पास में ही है।  आप २०० रुपये मांग रहे हैं।  ययह तो सरासर लूट है।  इससे अच्छा तो मैं पैदल ही चला जाऊंगा।      

 

 

 

 

 

उसके बाद उसने सामान उठाया और जाने लगा।  काफी दूर चलने पर उसे थकान महसूस होने लगी और मंदिर भी नहीं दिखाई दे रहा था, तभी उसे फिर से वही टैक्सी वाला मिल गया।      

 

 

 

 

 

उस व्यक्ति ने टैक्सी वाले से कहा, ” भाईसाहब, अब तो मैंने काफी दूरी पैदल ही तय कर ली है।  अब आप कितना पैसा लेंगे ? ” इसपर टैक्सी वाले ने कहा, ” महाशय अब ३५० रुपये होंगे।  ”      

 

 

 

 

यह सुनकर पहलवान गुस्से से बोला, ” यह क्या बात है भाई।  पहले आपने २०० बताया और अब जब मैं काफी दूरी  तय कर चुका हूँ तो आप ३५० बता रहे हैं। ”      

 

 

 

 

 

इसपर टैक्सी वाले ने कहा, ” महोदय आप विपरीत दिशा में जा रहे हैं।  मंदिर तो दूसरी तरफ है। ” इसके बाद उस व्यक्ति ने कुछ भी नहीं कहा और चुपचाप टैक्सी में बैठ गया।      

 

 

 

 

Moral – इसी तरह जीवन में कई बार हम किसी भी चीज को बिना सोचे – समझे शुरू कर देते हैं और फिर उसमें हमारा समय और मेहनत बर्बाद होती है।  इसीलिए एक बात हमेशा याद रखें कि सही दिशा होने पर ही मेहनत रंग लाती है।  यदि दिशा ही गलत हो तो इसका कोई भी लाभ नहीं होगा।       

 

 

 

अमूल्य शिक्षा Hindi Story for Kids Pdf Download

 

 

 

 

 

 

 

 

2- एक बहुत ही प्रसिद्ध साधू थे. उनके प्रवचन में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी. एक दिन उन्होंने देखा कि प्रवचन के समाप्ति के बाद भी एक मनुष्य बड़े ही निराश मन से वहाँ बैठा हुआ था.        

 

 

 

 

 

जब साधू ने उसका कारण पुछा तो उस युवक ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है. तब साधू ने उसे एक अन्य साधू के पास भेजा और कहा कि जाओ और उनकी दिनचर्या देखो. उससे ही तुम्हारी समस्या का निदान हो जाएगा.          

 

 

 

 

जब वह युवक उन साधू के पास गया तो देखा वह एक सराय की रखवाली करते थे. उस युवक ने वहाँ रहकर कुछ दिन तक उनकी दिनचर्या को देखा लेकिन उसे कुछ खास नहीं दिखा .        

 

 

 

 

वह साधू एकदम शांत और साधारण थे. उनमें कोई ज्ञान के लक्षण भी नहीं दिखाई पड़ते थे. हाँ, उनका व्यवहार शिशु जैसा निर्दोष और निर्मल था ….इसके अतिरिक्त उनकी दिनचर्या में कुछ और खास नहीं था.      

 

 

 

 

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उस युवक ने उन साधू की पूरी दिनचर्या देखि लेकिन रात्री में सोने से पहले और सुबह जागने के बाद वह साधू क्या करते थे , वह उसे ज्ञात नहीं था.          

 

 

 

 

तब उसने उन साधू से इस बारे में विचार किया तो उन साधू ने कहा कि कुछ नहीं, रात्री को मैं सारे बर्तन माजता हूँ और चूँकि रात्री भर में थोड़ी बहुत धूल पुनः जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें पुनः धो देता हूँ. बर्तन गंदे व धूल भरे ना हों इसका ध्यान रखना अतिआवश्यक है. मैं इस सराय का रखवाला जो हूँ.          

 

 

 

 

 

वह युवक इस साधू के पास से अत्यंत ही निराश होकर दुसरे साधू के पास लौटा और सारे बातचीत और घटनाक्रम को विस्तार से बताया. इस पर उन साधू ने कहा कि जो जानने योग्य था उसे तुम जान और सुनकर आये , लेकिन समझ नहीं सके. उनका कहने का अर्थ था कि रात्री तुम भी अपने मन को मांजो और सुबह फिर से धो लो.        

 

 

 

 

धीरे – धीरे चित्त निर्मल हो जाएगा. प्रत्येक मनुष्य एक दर्पण है . सुबह से सांझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है, जो मनुष्य इस धूल को ज़मने देते हैं , वे दर्पण नहीं रह पाते हैं और जैसा स्वयं का दर्पण होता है वैसा ही स्वाभाव होता है, वैसा ही ज्ञान होता है . अतः अगर दर्पण अगर स्वच्छ होगा तभी विचार भी शुद्ध होंगे. अब युवक को सारी बात समझ में आ गयी थी.              

 

 

 

 

 

 

 

 

 

3- एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, ” गुरुवर मेरे मन में एक प्रश्न है।  कुछ लोगों का कहना है कि जीवन एक संघर्ष है, जबकि वहीँ कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक खेल है तो वहीँ कुछ लोग जीवन को उत्सव मानते हैं।  अब इनमें से कौन सही है ?

 

 

 

 

गुरूजी ने बड़े ही ध्यान से प्रश्न को सुना और उसके बाद बोले, ” वत्स, जिन्हे गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है, जिन्हे गुरु मिल गया उनके लिए जीवन एक खेल है और जो गुरु कके बताएं हुए मार्ग पर चलते हैं उनके लिए जीवन उत्सव हो जाता है।

 

 

 

परन्तु शिष्य उत्तर से संतुष्ट नहीं था।  गुरूजी इस बात को समझ गए।  उन्होंने कहा, ” पुत्र मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ, जिससे आपको यह समझने में आसानी होगी।  “

 

 

 

 

उन्होंने कहानी सुनाना शुरू की।  एक बार की बात है एक गुरुकुल में शिष्यों ने अध्ययन सम्पूर्ण किया।  उसके बाद उन्होंने गुरु से कहा, ” गुरुदेव अब हमारी शिक्षा सम्पूर्ण हो गयी है।  अतः आप बताइएं आपको गुरुदक्षिणा में क्या चाहिए।  “

 

 

 

 

 

गुरूजी पहले तो मुस्कुराये और फिर बोले, ” मुझे गुरुदक्षिणा में एक थैला सूखी पत्तियाँ चाहिए।  ला सकोगे ? ” शिष्य बड़े ही प्रसन्न हुए।  उन्होंने सोचा था गुरूजी दक्षिणा में कुछ अधिक मांगेंगे।  उन्होने तुरंत ही हाँ कह दिया।

 

 

 

 

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तीनों शिष्य पत्तियां लाने की लिए नजदीकी जंगल में पहुंचे। जब वे जंगल में पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा क्योंकि वहाँ सूखी पट्टियां एक मुट्ठी ही थीं।

 

 

 

 

वे बड़े ही सोच में पड़ गए कि आखिर जंगल से सारी पत्तियां कौन ले गया ? इतने में उन्हें एक किसान दिखाई दिया।  वे प्रसन्न हुए और किसान के पास जाकर बोले, ” कृपया हमें एक थैला सूखी पत्तियां दे दें।  “

 

 

 

 

लेकिन किसान ने इसमें असमर्थता जताते हुए कहा, ” मैंने उन पत्तियों को पहले ही ईधन के रूप में प्रयोग कर चुका हूँ। ” उसके बाद तीनों शिष्य गाँव की और बढ़ने लगे।  उन्होंने सोचा शायद गाँव में कोई मदद कर दे।

 

 

 

 

गाँव में भी उन्हें कोई मदद नहीं मिली।  तभी उन्होंने एक व्यापारी को देखा और वे उस व्यापारी के पास पहुंचे और उससे भी एक थैले सूखी पत्तियों की मांग की।  लेकिन उन्हें यहां भी निराशा ही मिली क्योंकि उस व्यापारी उन पत्तियों से दोना बनाकर बेच दिए थे।

 

 

 

 

तीनों बड़े ही परेशान हो गए।  उन्हें परेशान देखकर व्यापारी एक बूढ़ी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित करती थी। लेकिन भाग्य यहां भी उनके साथ नहीं था और यहां भी पत्तियां समाप्त हो गयी थी।

 

 

 

तीनों बड़े ही निराश हुए। उनका हर प्रयत्न विफल हुआ।  वे निराश होकर बिना पत्तियों के ही गुरुकुल वापस आ गए। वे बहुत ही शर्मिन्दा थे।  तभी गुरूजी वहाँ आये और उन्होंने कहा, ” पुत्रों, हमारी गुरुदक्षिणा लाये। “

 

 

 

तीनों ने सिर झुका लिए और फिर पूरी बात बता दी। गुरूजी मुस्कुराये और बोले, ” निराश मत हो। अब मैं जो तुम्हे बताता हूँ वह ध्यान से सुनो। दुनिया की कोई भी चीज व्यर्थ नहीं होती। हर चीज का अपना महत्व होता है। जब मैंने आप लोगों को सूखी पत्तियां लाने लिए कहा तो आप लोगों को लगा यह तो व्यर्थ की चीज है बड़ी ही आसानी से मिल जायेगी। लेकिन आखिर नहीं मिली। इसीलिए जब तक गुरु का सानिध्य नहीं मिलता शिष्य को उचित ज्ञान प्राप्त नहीं होता। “

 

 

 

तीनों ही शिष्य बड़े ही ध्यान से बात को सुन रहे थे। उसके बाद गुरूजी ने कहा, ” हम जब भी किसी से मिले उसे यथायोग्य सम्मान दें।  इससे आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति और सहिष्णुता का विस्तार होता है और हमारा जीवन संघर्ष की जगह उत्सव बन जाता है और अगर जीवन को एक खेल माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम स्वस्थ और शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने व्यक्तित्व के निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें। “

 

 

 

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गुरूजी की बात सुनकर तीनों ही शिष्य बड़े प्रसन्न हुए।  उन्हें जीवन की अमूल्य शिक्षा प्राप्त हुई। तीनों ने गुरुदेव को प्रणाम किया और विदा लिया। कहानी सुनकर शिष्य को भी बात पूरी तरह से समझ आ गयी थी।  अब वह पूर्ण रूप से संतुष्ट था।

 

 

 

 

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Abhishek

नमस्कार पाठकगणों, मेरा नाम अभिषेक है। मैं मुंबई में रहता हूँ। मुझे हिंदी कहानियां लिखना और पढ़ना बहुत ही पसंद है। मैं कई तरह की हिंदी कहानियां लिखता हूँ। इसमें प्रेरणादायक कहानियां दी गयी है। मुझे उम्मीद है कि यह आपको जरूर पसंद आएगी। धन्यवाद।

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