Moral Education Story in Hindi Short / बच्चों की 3 शिक्षाप्रद कहानियां हिंदी में

Education Story in Hindi

Education Story in Hindi पाठकगणों यह Education Story in Hindi Long में शिक्षाप्रद कहानियां दी गयीं हैं।  आप इसे जरूर पढ़ें। 

 

 

 

 

कभी किसी पर दबाव ना बनाएं ( Moral Education Story in Hindi ) 

 

 

 

आज के समय में Parents बच्चों पर पढ़ाई को लेकर अतिरिक्त दबाव बना देते हैं।  उनके लिए यह Ego की बात हो जाती है कि कैसे दूसरे के बच्चे ज्यादा नम्बर्स लाये और हमारे बच्चे कम।

 

 

 

वे पढ़ाई के नाम पर उन्हें टार्चर करने लगते हैं।  हद तो तब हो जाती है जब वे बच्चों को पढ़ाई के विषय तक नहीं चुनने देते।  वे अपने हिसाब से विषय चुनते हैं।

 

 

 

हालांकि यह सही है कि इसमें वे बच्चों का भविष्य देखते हैं, परन्तु यह तो बच्चों से पूछना चाहिए कि बच्चे किस विषय में अपना भविष्य चाहते हैं।  यह उनका अधिकार है।  आज की यह Education Story in Hindi उसी पर आधारित है।

 

 

 

 

राजेपुर गांव में नवोदय विद्यालय का वार्षिक परीक्षा के उपरांत कक्षा में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थानों के लिए पुरस्कार वितरण का समारोह था। उस समारोह में राधिका भी अपनी बेटी ‘ प्रभा ‘ के साथ अपनी सहेली प्रिया के निमंत्रण पर विद्यालय गई थी।

 

 

 

 

विद्यालय के सभी विद्यार्थी एक ही पोशाक में उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। नाच और गाने के उपरांत सभी विद्यार्थियों को पुरस्कार वितरण किया जा रहा था। विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावक भी पुरस्कार ग्रहण करने मंच पर जा रहे थे।

 

 

 

 

हिंदी शिक्षाप्रद कहानी 

 

 

 

 

अंत में सोनू का नाम पुकारा गया, क्योकि उसका नंबर तृतीय स्थान पर था।  वह पुरस्कार लेने मंच पर गया लेकिन उसकी माँ शालिनी मंच पर  नहीं गई। पुरस्कार लेकर आने के उपरांत सोनू ने अपनी माँ से पूछा, ” आप हमारे साथ मंच पर पुरस्कार वितरण के समय उपस्थित क्यों नहीं हुई ? ”

 

 

 

 

सोनू की माँ ने कहा, ” जब तुम अगली कक्षा में प्रथम स्थान लाओगे, तब मैं तुम्हारे साथ पुरस्कार लेने मंच पर जाऊंगी। ”

 

 

 

 

 

शालिनी की यह बात सुनकर राधिका अपनी सहेली प्रिया से कहने लगी , ” दो साल का बच्चा जिसकी अभी खेलने की उम्र है, उसके ऊपर आकांक्षाओं का इतना बड़ा बोझ। क्या आज के अभिभावक अपना आकलन करते है, जब वह अपने बच्चे की उम्र के थे, उस समय वह कितना प्रतिशत नम्बर लाते थे ?  उस समय शायद उन लोगों को ठीक से शब्द का उच्चारण भी नहीं किया जाता होगा और हाथ में कलम पकड़ने का तरीका भी पता नहीं होगा ऐसे लोगों ने और ऐसे विद्यालयों ने बच्चो का बचपन ही छीन लिया है ? ”

 

 

 

 

Education Story in Hindi Pdf 

 

 

 

 

राधिका की यह बात सोनू की माँ शालिनी को बहुत ही नागवार लगी और उन्होंने राधिका से पूछ ही लिया, ” कि आपकी बेटी कौन से कक्षा में पढ़ती  है, और कितने नम्बर आए है ?” राधिका कुछ बोल पाती उससे पहले उसकी सहेली प्रिया ने जवाब दिया, ” इनकी बेटी के निन्यानवे प्रतिशत नम्बर आए है ,और वह कक्षा दो में पढ़ती है। लेकिन उसका स्कूल तो छोटा है और उसके पाठ्यक्रम भी छोटे है, इसलिए इतना प्रतिशत आता है।”

 

 

 

 

 

“क्या आपके बच्चे का पाठ्यक्रम ए से लेकर जेड तक अलग ढंग से लिखा जाता है ?क्या आपके बच्चे को क से लेकर ज्ञ नहीं पढ़ाया जाता है ? ” राधिका ने सोनू की माँ शालिनी से कहा।

 

 

 

बात लम्बी खीचती देखकर प्रभा ने अपनी माँ से कहा, “चलो माँ यहाँ से, यहाँ सिर्फ दिखावे की पढाई होती है।” जबकि, स्कूल कोई भी हो एक से लेकर सौ तक की गिनती तो एक ही रहेगी, गणित एक ही रहेगा और कला भी एक ही रहेगी, तो इतने बड़े स्कूल का दिखावा क्यूँ ? इससे अच्छा तो अपना ही स्कूल है। ”

 

 

 

एक छोटी सी बच्ची के मुंह से ऐसी बातें सुनकर सभी अवाक् रह गए और सोनू की माँ शालिनी को भी बात समझ में आ गयी और सोनू से कहा, ” मुझे तुम पर गर्व है जो तुमने इतने अच्छे नम्बर्स लाये।  ” यह बात सुनकर सोनू बहुत खुश हुआ।

 

 

 

 

 

Moral – कभी भी बच्चों पर किसी बात का अतिरिक्त प्रेशर नहीं डालना चाहिए।  इससे बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ता है।

 

 

 

Moral Of The Story – Never put any additional pressure on children. This has a negative effect on children.

 

 

 

 

सच्ची दोस्ती ( Education Story in Hindi )

 

 

 

 

2-  Education Story in Hindi  यह पंचतंत्र की शिक्षाप्रद हिंदी कहानी है। मित्रों संगठन में बड़ी शक्ति होती है।  अगर संगठित होकर कोई भी कार्य किया जाए तो सफलता अवश्य ही प्राप्त होती है।  आज की यह कहानी इसी पर आधारित है।

 

 

 

एक जंगल में चूहा, कौवा, हिरण और कछुआ चार मित्र रहते थे।  अलग – अलग  होने बावजूद वे बहुत मेल – जोल से रहते थे।

 

 

 

 

वे एक – दूसरे की भावनाओं को बड़े ही अच्छे से समझते थे।  वे आपस में घुल-मिलकर रहते थे, आपस में खूब बातें करते और खेलते थे।  अच्छे से समय बीत रहा था।

 

 

 

 

 

वन में एक स्वच्छ तालाव था, जिसमें कछुआ रहता था और पास में ही एक जामुन का पेड़ था। उसके ऊपर बने घोसले में कौवा रहता था और पेड़ के नीचे की बिल में चूहा रहता था और वहीँ निकट ही घनी झाड़ियों में हिरण रहता था।

 

 

 

 

दिन भर कछुआ तालाव के बाहर आकर धूप सेंकता और पानी में अटखेलियां करता और बाकी के तीनों मित्र भोजन की तलाश में बाहर दूर तक जाते और फिर सूर्यास्त के बाद उनके लौटने पर महफ़िल सजती और चारो खूब बाते करते।

 

 

 

 

एक दिन शाम को चूहा और कौवा तो लौट आए, परन्तु हिरण नहीं लौटा। तीनो मित्र बैठकर उसकी राह देखने लगे। उनका मन खेलने को भी नहीं हुआ। कछुआ भर्राए गले से बोला “वह तो रोज तुम दोनों से भी पहले लौट आता था। आज पता नहीं, क्या बात हो गई, जो अब तक नहीं आया। मेरा तो दिल डूबा जा रहा हैं।

 

 

 

 

चूहे ने बड़े ही चिंतित स्वर में बोला, ” यह तो बड़ी ही चिंता की बात है। लगता है हिरण जरूर किसी मुसीबत में फंस गया है। हमें जरूर कुछ करना चाहिए।  ”

 

 

 

 

कौवा ऊपर से उस दिशा में जिधर हिरण रोज चरने जाता था देखते हुए बोला, ” हिरण कहीं नजर नहीं आ रहा है। अन्धेरा बढ़ता ही जा रहा है।  इस समय ढूंढने जाना भी ठीक नहीं है। हमें सुबह तक की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। सुबह मैं उड़कर जाऊंगा और उसका पता लगाकर सबको बताऊंगा ”

 

 

 

 

 

कछुए ने चिंता में सर हिलाकर बोला, ” मुझसे तो सुबह तक इन्तजार नहीं होगा। मुझे तनिक भी नींद नहीं आएगी। मेरी चाल भी धीमी है अतः मैं अभी ही उसे ढूंढने के लिए निकलता हूँ। आप दोनों सुबह आ जाना।  ”

 

 

 

 

तभी चूहा बोला, “मैं भी आपके साथ चलता हूँ। कौवा भाई तुम  सुबह  होते ही तेजी से आ जाना। ” चूहा और कछुआ चले गए।  किसी तरह कौवे ने रात काटी। नींद भला कैसे आती। सुबह होते ही वह हिरण को ढूढने निकल पड़ा।

 

 

 

वह चारो तरफ देखते हुए जा रहा था। कुछ दूर चलने पर उसे चूहा और कछुआ दिखाई दिए। उसने उनसे कहा, ” वह तेजी से उड़कर हिरण को ढूढने जा रहा है।  ”

 

 

 

 

वह हिरण को पुकारते हुए आगे बढ़ने लगा। तभी उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। वह घबरा गया और तेजी से उस तरफ उड़ा। उसने देखा कि हिरण एक शिकारी के जाल में फंस गया है और रोते हुए छटपटा रहा था।

 

 

 

 

कौवे को देखकर वह और भी रोने लगा और रोते हुए बोला, ” मैं शाम को वापस लौट रहा था।  रास्ते में शिकारी ने जाल बिछा दिया था।  मैं उसे देख नहीं पाया और उसमें फंस गया। मैंने छुड़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सका। अब सुबह हो गयी वह कभी भी आ सकता है। अब वह मुझे ले जाएगा। मित्र कछुआ और चूहे को मेरा आखिरी नमस्कार कहना।”  यह कहकर वह और भी रोने लगा।

 

 

 

 

कौवे की आँख में आंसू आ गए। वह भर्राते हुए गले से बोला, ” मित्र हम तुम्हे कुछ नहीं होने देंगे। तुम चिंता मत करो। चूहा और कछुआ भी नजदीक आ गए हैं। मैं अभी चूहे को लेकर आता हूँ। तुम हिम्मत मत हारना।  ”

 

 

 

 

 

यह कहकर कौवा तेजी से उड़ चला। उसकी बातों से हिरण में थोड़ी हिम्मत आयी। वह तेजी से चूहा और कछुआ के पास गया और जल्दी से उन्हें सारी बात बता दी।

 

 

 

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चूहे ने कौवा से कहा, ” मित्र  तुम मुझे तेजी से हिरण के पास ले चलो। ” उसके बाद कौवा चूहे को पीठ पर बिठाकर तेजी से हिरण के पास लाया और चूहे ने फ़टाफ़ट जाल काट दिया।

 

 

 

तब तक वहाँ कछुआ भी आ पहुंचा। आजाद होकर हिरण बड़ा खुश हुआ और बोला, ” मैं बड़ा ही भाग्यशाली हूँ जो मुझे ऐसे सच्चे मित्र मिले। चारो मित्र ख़ुशी – ख़ुशी नाचने लगे।

 

 

 

तभी कुछ आहट सुनकर हिरण ठिठका। उसने कहा, ” सभी लोग छुप जाओ। शिकारी आ रहा है।” उसके बाद सभी छुप गए। कौवा पास के पेड़ की डाल पर  जा बैठा, चूहा एक बिल में घुस गया और हिरण झाडी में जाकर छिप गया। लेकिन बेचारा कछुआ अभी कुछ ही कदम चला होगा कि शिकारी आ गया।

 

 

 

 

 

शिकारी ने जब जाल का हाल देखा तो उसके होश उड़ गए। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। वह इधर – उधर देखने लगा तभी उसे कछुआ दिखाई दिया। उसने झट से उसे पकड़ लिया और बोला, ” चलो कुछ  तो मिला।  ”

 

 

 

 

उसने कछुए को झोले में डाला और वहाँ से चलते बना। तीनों मित्र यह सब देख रहे थे। शिकारी के जाते ही वे तीनों आये और चूहा बोला, ” शिकारी कछुआ मित्र को ले जा रहा है। हमें कुछ करना चाहिए।  ”

 

 

 

तभी हिरण का दिमाग काम किया और उसने फ़टाफ़ट अपना प्लान सबको समझा दिया। उसके बाद हिरण लगड़ाते हुए शिकारी के सामने से धीमी गति से निकला। शिकारी हिरण को ऐसी हालत में देखकर खुश हो गया और थैला जमीन पर रखकर हिरण के पीछे दौड़ा।

 

 

 

जब वह कुछ दूर आगे गया तो चूहा फटाफट शिकारी के झोले को काट दिया और उसमे से कछुआ निकलकर अच्छे जगह पर छुप गया। उधर थोड़ी दूर जाने के बाद हिरण तेजी से चौकड़ी मारते हुए भाग निकला।

 

 

 

शिकारी दांत पिसता रह गया। वह तेजी से उस जगह पर आया जहां उसने थैला रखा था। वहाँ का नज़ारा देखकर उसका दिमाग ठनका और वह सर पकड़ कर वहीँ बैठ गैया।

 

 

 

Moral – इस कहानी से हमें यही शिक्षा ( Shiksha ) मिलती है कि दोस्त कम रहें लेकिन सच्चे हों तो बड़ी सी बड़ी मुसीबत का सामना आसानी से किया जा सकता है। 

 

 

 

Moral Of the Story – Friends be Less but be True.

 

 

 

 

सच्ची ईमानदारी 

 

 

 

 

 

3- Education Story in Hindi  ईमानदारी दुनिया का सबसे पुण्य कार्य है।  अगर आप ईमानदारी से कोई कार्य करते हैं तो आपको परम शान्ति की अनुभूति है और आपको खुद पर गर्व होता है।  आज की यह ईमानदारी की कहानी इसी पर आधारित है। 

 

 

 

शंकरपुर गांव में रामप्यारे नाम का एक किसान रहता था। लोग उन्हें सिर्फ प्यारे के नाम से ही पुकारते थे। रामप्यारे के पास पशुओं का समूह था।चार गउए और भैसें थी। अप्रैल मई के महीने में फसल की कटाई हो जाने के पश्चात खेत खलिहान जब वीरान हो जाता है। तब उन जगहों पर मवेशियों के झुण्ड ही नजर आते है।

 

 

 

 

अप्रैल और मई में जब किसानों के पास कोई काम नहीं रहता था तो वह अपने अपने मवेशियों को सुबह से ही मैदान में उदर पूर्ति के लिए समूह में छोड़ दिया करते थे। उनमें से प्यारे काका भी एक थे।

 

 

 

 

 

प्यारे काका अपने मवेशियों को सड़क से उतार कर मैदान में ले जा रहे थे। तभी अचानक उनकी नजर एक मैली पोटली पर ठिठक गई। उन्होंने हाथ में पकड़े डंडे से उस पोटली को दूर हटाना चाहा लेकिन वह कुछ ही दूर पर गिर गई। पोटली के गिरने पर कुछ हलकी सी आवाज आई। प्यारे काका ने सोचा, ”  अगर पोटली वजन नहीं होती तो इस ठोकर के साथ वह काफी दूर चली जाती ?”

 

 

 

 

प्यारे काका के सभी मवेशी उदर पूर्ति के लिए मैदान में उतर चुके थे। प्यारे काका को उस पोटली को देखने की उत्सुकता जाग उठी तभी उन्होंने देखा कि गांव के किसान भी अपनी मवेशीयों की उदर पूर्ति के लिए उन्हें लेकर आ रहे है।

 

 

 

 

 

उन लोगों को आता देख प्यारे काका उस पोटली को अपने गमछे में बांधकर उसकी पगड़ी बनाकर अपने सर के ऊपर रख लिया, जिससे धूप से बचाव भी होता रहे और किसी को शक भी न हो।

 

 

 

Story in Hindi With Shiksha

 

 

 

 

 

गर्मी के कारण लोग अपने मवेशियों को लेकर जल्द ही घर लौट आते थे। अन्य लोगों के साथ प्यारे काका भी अपने मवेशियों को व्यग्रता के साथ लेकर आ रहे थे, कारण कि उनके मन में उस पोटली को खोलकर देखने की ईच्छा प्रबल हो उठी थी।

 

 

 

 

 

रामू काका  जो अन्य लोगों के समूह में थे उन्होंने ताड़ लिया कि अवश्य ही कोई बात है ? तभी प्यारे इतनी शीघ्रता से अपने मवेशियों को घर ले जा रहा है। उनसे रहा नहीं गया और प्यारे से पूछ ही लिया, ” क्यों प्यारे,आज मवेशियों को ले जाने में तुमको इतनी ख़ुशी क्यों हो रही है ?”

 

 

 

 

 

 

प्यारे और रामू दोनों हमजोली  थे। प्यारे ने रामू से कहा, “देखते नहीं हो इतनी भींषण गर्मी पड़ रही है और तुम्हें व्यंग सूझ रहा है। ” यह कहकर प्यारे अपने मवेशियों को लोगों से अलग कर तीव्रता से हांकते हुए अपने घर की ओर चला गया।

 

 

 

 

 

 

मवेशियों को खूंटे से बांधने के उपरांत वह नींम की छांव में निढाल होकर चारपाई पर लेट गया। उसकी अर्धांगिनी कमलादेवी एक ग्लास पानी और मीठा लेकर उनके सामने प्रस्तुत थी।

 

 

 

 

प्यारे काका की पगड़ी उनके सर से छूटकर चारपाई के नीचे गिर गई थी। कमलादेवी ने प्यारे से कहा, “यह सुदामा की पोटली कहां से उठाकर लाए हो और इसमें क्या है ?”

 

 

 

 

 

 

 

एक साथ इतने प्रश्न सुनकर प्यारे काका ने कमलादेवी से कहा, “यह पोटली हमें स्वतः ही मिल गई और तुम स्वतः ही खोलकर देख लो कि इसमें क्या है ?”

 

 

 

 

 

कमलादेवी ने जैसे ही उस पोटली को खोला उनका मुंह हैरत से खुला ही रह गया। प्यारे काका ने कमलादेवी से पूछा, “क्या बात है ?”कमलादेवी ने कहा, “आप स्वयं ही देख लो। ”

 

 

 

 

 

प्यारे काका की नजर जैसे ही उस पोटली पर गई तो उनका भी कलेजा मुंह को आ गया। कारण कि उस पोटली में स्वर्ण आभूषण और रजत (चांदी का आभूषण ) था।

 

 

 

 

 

 

प्यारे काका ने अपनी अर्धांगिनी से कहा, “इसे सही ढंग से रख दो। हम उस आदमी को ढूंढकर उसे लौटने का प्रयास करेंगे, न जाने उस बेचारे पर क्या बीत रही होगी ?”यह सोच कर प्यारे काका व्यथित हो उठे।

 

 

 

 

अप्रैल मई के महीने में आठ बजे के बाद बाहर निकलने में सबके हौसले पस्त हो जाते है। ऐसे में नारायण प्रजापति उस सड़क के कई चक्कर लगा चुके थे, जिस पर उनकी मूल्यवान पोटली उनसे रूठकर दूर चली गई थी। जिसमे उनकी पत्नी का स्वर्ण और रजत आभूषण था। उसे लेकर वह स्वर्णकार के पास जा रहे थे, क्योंकि उनके लड़की की शादी को कुछ ही दिन शेष था और यह घटना हो गई।

 

 

 

 

 

नारायण प्रजापति थककर एक पेड़ की छांव में  निढाल होकर बैठ गए थे। शाम को चार बजे थे लेकिन धूप कम नहीं हुई थी। घर न पहुँचने के कारण नारायण के भाई का लड़का राजू उनको ढूंढते हुए आया और उन्हें एक पेड़ की छांव में अर्ध मूर्छित अवस्था में देखकर वह सशंकित हो उठा।

 

 

 

 

 

उसने नारायण के पास आकर पूछा, “चाचा क्या बात है, आप इस अवस्था में क्यूँ बैठे है ?” भारी मन से नारायण प्रजापति ने राजू को पूरा वृतांत कह सुनाया। राजू ने नारायण प्रजापति से कहा, “अभी आप मेरे साथ घर चलिए कल सुबह मैं भी आपके साथ आऊंगा और लोगो से मुलाकात करेंगे शायद कुछ पता चल जाय।”

 

 

 

 

 

 

 

प्यारे काका ने अपनी अर्धांगिनी से कहा, “कल सुबह मैं अपने मवेशियों को रोज की अपेक्षा शीघ्र ही मैदान में छोड़ दूंगा और तुम हमें वह पोटली दे देना। शायद वह आदमी उस पोटली को ढूंढने का प्रयास करते हुए दिख जाए, तो मैं उसे लौटा दूंगा।” प्यारे काका को नींद कहां थी। उस आदमी की पीड़ा का अनुभव कर उनकी नींद सचमुच उड़ चुकी थी।

 

 

 

 

प्यारे काका पोटली को गमछे में लपेटकर सर के ऊपर बांध लिए और अपने मवेशियों को मुंह अँधेरे ही उदरपूर्ति के लिए मैदान में छोड़ दिए और स्वयं सड़क के किनारे बैठ गए यह सोचते हुए कि शायद वह आदमी दिख जाए जिसका आभूषण खो गया था।

 

 

 

 

 

 

तभी एक उम्रदराज और एक नौजवान बात करते हुए उस सड़क से उनकी ओर ही आ रहे थे। उम्रदराज आदमी कह रहा था “शायद यहीं कहीं वह पोटली गिरी होगी?”

 

 

 

 

लड़के ने कहा, “ऐसा आप कैसे कह सकते है चाचा ?” मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि यहाँ आने के थोड़ी ही देर पहले मैंने उस पोटली के स्पर्श का अनुभव किया था। कुछ दूर जाने के उपरांत मैंने पुनः अनुभव किया कि हमारी लाठी हलकी लग रही है जिसमे मैंने उस पोटली को बांध रखा था।” चाचा ने कहा।

 

 

 

 

 

राजू ने उन उम्रदराज आदमी से कहा, “जमाना कहाँ से कहाँ निकल गया आप लोग लकीर के फकीर ही रह गए इसलिए यह नुकसान उठाना पड़ा।” लेकिन प्यारे काका समझ चुके थे कि यह पोटली इस उम्रदराज व्यक्ति की है।

 

 

 

 

 

प्यारे काका ने देर करना उचित नहीं समझा और श्रीमान ठहरिए कहते हुए उन दोनों आदमियों के पास गए और वह पोटली सर में बंधे गमछे से खोलकर उन दोनों को दिखाई और पूछे, ” यह आपकी पोटली है ? जिसकी आप दोनों अभी अभी चर्चा कर रहे थे।”अंधा क्या चाहे दो आँखे और वह उम्रदराज आदमी ने उस पोटली को लेकर अपने कलेजे से लगा लिया कि शायद यह फिर से न खो जाए।

 

 

 

 

 

 

प्यारे काका ने कहा, “यह पोटली हमें कल इसी जगह पर मिली जब मैं अपने मवेशियों को मैदान में लेकर जा रहा था और तब से अब तक हमारी आंखों में नींद नहीं आई। यह सोचकर कि जिसकी यह पोटली खो गई है उसका क्या हाल होगा ? अच्छा आप अपनी अमानत अच्छे से देख लीजिए, अब मैं चलता हूँ क्योंकि मवेशियों को ले जाने का समय हो गया है ?” और प्यारे काका चले गए।

 

 

 

 

 

 

दो चार लोगो का जमावड़ा और हो गया था। लेकिन प्यारे काका मवेशियों के साथ अपने घर पहुँच गए थे। कई लोग एक साथ कह रहे थे। ईमानदार और ईमानदारी अभी भी जीवित है। लेकिन यह शब्द सुनने के लिए प्यारे काका वहां पर नहीं थे। वह अपनी नींम की छांव में बैठकर आराम कर रहे थे। उनके मुखमण्डल पर परमसन्तोष था। 

 

 

 

 

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Abhishek

नमस्कार पाठकगणों, मेरा नाम अभिषेक है। मैं मुंबई में रहता हूँ। मुझे हिंदी कहानियां लिखना और पढ़ना बहुत ही पसंद है। मैं कई तरह की हिंदी कहानियां लिखता हूँ। इसमें प्रेरणादायक कहानियां दी गयी है। मुझे उम्मीद है कि यह आपको जरूर पसंद आएगी। धन्यवाद।

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1 Response

  1. pankaj kumar says:

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