Moral Hindi Story Shiksha Ke Sath / बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ 5 हिंदी कहानी

Moral Hindi Story Shiksha Ke Sath मित्रों इस पोस्ट में Shikshaprad Kahani Bacchon Ki की शिक्षाप्रद कहानिययं दी गयी हैं।  सभी Hindi Story Shiksha Ke Sath  बहुत ही प्रेरक और शिक्षाप्रद हैं। 

 

 

 

 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ( Moral Hindi Story Shiksha Ke Sath ) 

 

 

 

 

यह लड़की तो बहुत ही चतुराई  से अपना कार्य कर रही है। कही भी किसी जगह इसने गलती के लिए कोई संभावना ही नहीं छोड़ी है। ”  कला की शिक्षिका ने अपनी सहयोगी शिक्षिका मालिनी खन्ना से कहा।

 

 

 

 

यह लड़की है या कंप्यूटर , क्योंकि इसकी हर विषय में पारंगता है। शिवानी बोस जो जनार्दन कॉलेज में कला संकाय की वरिष्ठ शिक्षिका थी , उन्ही के सानिध्य में सभी छात्र – छात्राए अपने कला का विकास करते हुए अपने उज्वल भविष्य की ओर अग्रसर थे।

 

 

 

 

Stri Shiksha Par Story in Hindi

 

 

 

 

 

” देखिए श्री जी  मैंने आप दोनों का वार्तालाप  करते हुए यह चित्र बनाया है। ” रक्ताभ वर्ण की लड़की  जिसका नाम कंचन था और वह कॉलेज से दो किलोमीटर पश्चिम मोहनपुर गांव में रविंद्र प्रजापति की ज्येष्ठ पुत्री थी। उसने  वह चित्र दोनों शिक्षिकाओं के सामने रख दिया।

 

 

 

 

दोनों शिक्षिकाओं की नजर उस चित्र पर पड़ी तो दोनों ही  जड़वत खड़ी रह गई। आखिर में कंचन को ही बोलना पड़ा, ” श्री जी  कैसा है यह चित्र ? ”

 

 

 

” सुन्दर से अति सुंदरतम।  तुम हमारे कॉलेज की गौरव  हो और तुम्हारा भविष्य अति उज्वल है। तुम्हारे  ऊपर ” माँ सरस्वती ” की अपार ‘ अनुकम्पा ‘ की वर्षा हो रही है।   ” दोनों के मुख  से एक साथ निकला।

 

 

 

” माँ सरस्वती को तो हमने नहीं देखा …… लेकिन सरस्वती माँ के रूप में आपकी कृपा  हम सब पर जरूर बरस रही है। ” कंचन ने कहा।

 

 

 

 

शिवानी बोस हर वर्ष अपने कॉलेज से तीन छात्र – छात्राओं का कला संकाय से चयन करती और उन्हें प्रदेश स्तर पर सबसे ऊपर जब -तक ” स्वर्ण पदक ” नहीं मिलता उन्हें संतोष ही नहीं होता और यही उनका सबसे बड़ा पारितोषक  था।

 

 

 

 

उनका ध्येय  था कि छात्र – छात्राए जनार्दन कॉलेज से निकलने के बाद वह स्वावलंबी  हो और दूसरे लोगों को भी काम दे सके। इस उद्देश्य में वह अभी तक पूर्ण रूप से सफल थी।

 

 

 

वार्षिक परीक्षा की तैयारी जोर – शोर से चल रही थी। अपने कला के कक्ष में पहुंचकर  शिवानी बोस ने छात्र – छात्राओं को सम्बोधित करते हुए पूछा, ”  परीक्षा की तैयारी कैसी चल रही है ? ” सभी का सम्मिलित स्वर गूंजा, ” बहुत उचित ढंग से चल रही है। ”

 

 

 

 

” इस बार भी प्रादेशिक स्तर पर स्वर्ण पदक से  कम पर  संतुष्टि  नहीं होगी। ” शिवानी बोस ने कहा।

 

 

 

” हम उचित प्रयास करेंगे।  ” छात्रों ने कहा।

 

 

 

वार्षिक परीक्षा हो चुकी थी। आज परिणाम आने वाला था। जैसी सबकी आशा थी परिणाम उससे बढ़कर आया। कंचन को देश भर में कला ” स्पर्धा ” में पहला स्थान प्राप्त हुआ था।

 

 

 

यह सुचना जैसे ही जनार्दन कॉलेज में पहुंची तो वहां के सभी छात्र – छात्राए और पूरे कॉलेज के कर्मचारियों के साथ प्रधानचार्य राम गोपाल मिश्रा अत्यंत प्रसन्न हुए।

 

 

 

 

राम गोपाल मिश्रा के पास तो बधाइयों के  निरंतर सन्देश आ रहे थे और वह बहुत ही आह्लादित थे। देश की केंद्रीय टीम से जनार्दन कॉलेज के प्रधानचार्य को सूचित किया गया कि आपके कॉलेज की छात्रा को पूरे देश में  प्रथम स्थान प्राप्त करने के कारण गणतंत्र  दिवस पर सम्मानित किया जाएगा।

 

 

 

” शिवानी जी मैं आपका कैसे आभार व्यक्त करूँ आप तो  साक्षात सरस्वती की प्रतिमूर्ती हैं। आपके निर्देशन में हमारे कॉलेज की छात्रा कंचन  को गणतंत्र दिवस पर शिक्षामंत्री द्वारा सम्मानित किया जाना है।  इससे हमारे कॉलेज की ‘ ख्याति ‘और बढ़ जाएगी। ” प्रधानाचार्य ने कहा।

 

 

 

 

गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर कंचन को सम्मानित किया गया।  अपने सम्बोधन में कंचन ने कहा, ” विद्या सबके लिए आवश्यक है।  हर किसी को जरूर ही पढ़ना चाहिए।  शिक्षा में कभी भी भेदभाव नहीं होना चाहिए।  आज भी हमारे देश में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की शिक्षा पर कम ध्यान दिया जाता है, जो कि उचित नहीं है।  कहा जाता है एक पुरुष शिक्षित होता है तो व्यक्ति शिक्षित होता है और एक महिला शिक्षित होती है तो परिवार शिक्षित होता है।  आईये आज प्रण ले बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। “

 

 

 

सभी लोगों ने खूब ताली बजाई और कंचन को शिक्षामंत्री ने सम्मानित किया और शुभकामना दी।

 

 

 

 

सफलता हिंन्दी कहानी ( Moral Hindi Story Shiksha Ke Sath ) 

 

 

 

 

 

2- सफलता और असफलता जीवन का हिस्सा है।  परन्तु अगर कोई यह ठान ले कि किसी भी कीमत पर हमें सफल ( Success )  होना है, तो पूरी कायनात उसे सफल बनाने में जुट जाती है। आईये सफलता ( Success Stories in Hindi Pdf ) से जुडी कुछ कहानियां पढ़ते हैं।

 

 

 

एक जंगल में एक विशाल हाथी रहता था . उसे अपनी ताकत पर बहुत घमंड था . सभी जानवर उससे डरते थे . यहाँ तक कि शेर भी उससे दस कदम दूर ही रहता था .

 

 

 

 

एक दिन की बात है. एक मैना को ढेर सारा दाना रास्ते में मिला . वह बड़ी खुश हुई और धीरे – धीरे सारा दाना अपने घोसले में जमा कर लिया . वह बहुत खुश थी और ख़ुशी का इज़हार करते हुए गाना गाने लगी . तभी उधर से वह हाथी गुजरा .

 

 

 

 

उससे मैना की ख़ुशी बर्दाश्त नहीं हुई . उसने बोला, ” ऐ मैना, आज तू बड़ी खुश दिख रही है . गीत गाना बंद कर . नहीं तो ……” हाथी अभी चुप भी नहीं हुआ था कि मैं बोल पड़ी, ” नहीं तो क्या ? मैं अपने घोसले में गा रही हूँ ना . तुम्हे क्या दिक्कत हो रही है भला . ”

 

 

 

 

” अच्छा ऐसी बात है ले फिर अब घोसला ही तोड़ देता हूँ ” ऐसा कह कर हाथी पेड़ को हिलाने लगा . मैना डर गयी . उसने कहा , ” हाथी भैया, मुझे माफ कर दो . मुझसे गलती हो गयी . माफ़ कर दो प्लीज ”

 

 

 

 

हाथी बड़ा खुश हुआ. उसे तो दूसरों को तकलीफ देने में बड़ा मजा आता था . ठंडी का मौसम शुरू होने वाला था . हलकी – हलकी ठंडी पड़ रही थी . सभी जानवर धूप  सेंकने के लिए इकठ्ठा हुए थे .

 

 

 

आपस में गपसप चल रही थी. तभी हाथी की चर्चा शुरू हो गयी . लोमड़ी ने कहा, ” हाथी से बड़ा बचकर रहना पड़ता है . जब देखो परेशान करता रहता है ” .

 

 

 

 

तभी मैना ने भी अपनी बात बताई. तब तक खरगोश बोला, ” अभी परसों की बात है . हाथी ने मेरा गाजर छीन लिया. ” तब तक चींटी बोली, ” सही बात है . वह बहुत ही बदमाश है . उसे सबक सिखाना पडेगा . ”

 

 

 

 

सभी जानवर एक – दुसरे का मुंह देखने लगे . बन्दर बोला, ” चींटी बहन, अरे सोच – समझ कर बोलो . वह हाथी है वह भी विशालकाय और ताकतवर . शेर भी उससे दस कदम दूर ही रहता है . ”

 

 

 

 

” तो क्या हुआ?  मैं नहीं डरती हाथी से ” चींटी ने कहा . तभी वहाँ हाथी भी पहुँच गया . उसने कहा अच्छा तुम मुझसे नहीं डरती . अभी एक फूंक मारूंगा तो ना जाने कहाँ जाकर गिरोगी .

 

 

 

 

” मैं भी चाहूँ तो आपको हिला सकती हूँ .  ना विश्वास हो तो रख लो मुकाबला . हो जाएगा फैसला . एक बात और अगर मैं जीत गयी तो तुम किसी जानवर को परेशान नहीं करोगे . बोलो मंजूर है . ” चींटी ने कहा .

 

 

 

 

 

बाकी जानवर तो बस चींटी का मुंह ही देख रहे थे . हाथी जोर से हंसा और बोला एक बार और सोच लो . ” मैंने सोच लिया है . कल मुकाबला रखा जाएगा . तुम भी अपनी ताकत दिखाना और मैं भी . ” चींटी बोली .

 

 

 

 

 

” ठीक है. ” हाथी ने भी हुंकार भरी.  कल का दिन आया . सभी जानवर तय समय पर पहुँच गए . हाथी ने अपनी ताकत दिखाना शुरू किया. उसने पास खड़े पेड़ों को उखाड़ दिया. पत्थर इधर – उधर फेंक दिए .उसकी ताकत देखकर सभी हैरान रह गए . सबको यकीं हो गया चींटी तो हारेगी ही .

 

 

 

 

 

अब चींटी की बारी आई. उसने कहा, ” हाथी भैया, ” आप एक जगह खड़े हो जाओ . मैं आपको हिलाकर रख दूंगी . ” हाथी घमंड में चूर था . वह एक जगह खडा हो गया .

 

 

 

 

चींटी आगे बढ़ने लगी . अचानक वह इतनी तेजी से आगे बढ़ी कि उसे कोई देख ही नहीं पाया . सब लोग हैरान हो गए कि आखिर चींटी कहाँ गयी . इतने में हाथी चिल्लाने लगा . अरे मेरे सूंड में क्या हो रहा है . बहुत दर्द हो रहा है .

 

 

 

 

तब चींटी बोली, ”  हाथी भईया, मैं ही हूँ . बताओ क्या हाल है ? अब पता चला दूसरों को भी ऐसी ही तकलीफ होती है . और काटूँ ? ” अरे नहीं …बस मैं अपनी हार मानता हूँ . अब मैं किसी को भी परेशान नहीं करूंगा . तब चींटी सूंड से बाहर निकल आई और सबने चींटी की खूब प्रसंशा की .

 

 

 

मित्रों सबके अन्दर एक ना एक ताकत छुपी होती है . जरूरत होती है उसे पहचानने की और सही जगह और सही समय पर उपयोग करने की . अगर हम ऐसा करने में सफल हो गए तो बड़े से बड़ा ताकतवर भी हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा  और हमें सफलता ( Success ) अवश्य ही मिलती है।

 

 

 

शिक्षाप्रद कहानी आत्म निर्भरता ( Shikshaprad Moeal Kahaniyan Bacchon Ki ) 

 

 

 

 

 

3- सुधीर बड़ा ही स्वाभिमानी लड़का था, लेकिन मध्यम वर्ग का था। मध्यम वर्ग की हालत बड़ी ही विचित्र होती है। पैर को ढको तो सर खुला रहता है, सर को ढको तो पैर खुला रहता है।

 

 

 

 

 

सुधीर गोविन्द काका के घर सायकल मांगने गया। उसे कहीं जाना आवश्यक था। सायकल तो नहीं मिली लेकिन उलाहना अवश्य मिला। जब देखो कोई न कोई सायकल मांगने आ जाता है। सुधीर के स्वाभिमान को उस उलाहने से बहुत ठेस लगी। वह वापस लौट गया।

 

 

 

 

फिर उसने मेहनत से पांच हजार रूपए इकट्ठा करके दो टूटी सायकल खरीदी और सायकल के मरम्मत का कार्य करने लगा। मृदु स्वभाव और किस्मत का साथ, सुधीर के प्रयास से उसकी दुकान चल गई।

 

 

 

 

आज वह सुधीर सायकल स्टोर का मालिक था। पांच नौकर थे, लेकिन वह अपने हाथ से स्वयं पंक्चर बनाता है। दो सायकल हमेशा रिजर्व रखता, कि शायद कोई समय का मारा मिल जाए तो उसकी सहायता कर सके। उसे अपना वह दिन याद था, जब उसे एक सायकल के लिए उलाहना मिला था।

 

 

 

 

सीख – आत्मनिर्भर रहने से स्वतः दूसरों की सहायता हो जाती है। इसलिए हमें खुद को आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

 

 

 

 

शिक्षा का बाजारीकरण 

 

 

 

 

 

5- यह एक Shikshaprad Moral Kahani Bacchon Ke Liye है। एक अध्यापक ने एक नए शहर में अपना विद्यालय खोला। वह एक अर्धशहरी क्षेत्र था।  एक बड़ी संख्या गाँव में बसती थी।

 

 

 

शहरों में तो लोग पढ़े – लिखे थे, परन्तु गांव के ज्यादातर लोग अनपढ़ या फिर कम पढ़े-लिखे थे।  अध्यापक ने सोचा, ” गाँव के लोग कम पढ़ें – लिखे हैं, सो उनके घर जाकर बच्चों को विद्यालय में पढ़ाने के लिए बोलता हूँ।  वे अवश्य ही मानेंगे। ”

 

 

 

 

 

ऐसा सोचकर अध्यापक महाशय गावों में गए और घर – घर जाकर वे बच्चों को बुलाते और उनके माता – पिता के समक्ष उन बच्चों से कठिन प्रश्न पूछते और जब वे उनका उत्तर नहीं दे पाते तो अध्यापक महाशय उन बच्चों का मजाक उड़ाते हुए उनके माता – पिता से कहते, ” अरे इन्हे विद्यालय भेजिए।  क्यों अपने जैसा बनाना चाहते हैं ? थोड़ी सी फीस, ड्रेस तथा कुछ किताबें, बस यही तो लगेंगी। ”

 

 

 

माता – पिता भी बच्चों के भविष्य के लिए बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए तैयार हो जा रहे थे। अध्यापक महाशय बहुत ही खुश हुए। उन्होंने सोचा, ” कुछ और छात्र मिल जाएँ तो विद्यालय चल निकलें। ”

 

 

 

यह सोचकर वे अगले घर में गए।  वहाँ उन्होंने देखा, ” एक लड़का बहुत ही लगन से पढ़ाई कर रहा था।  ” यह देखकर उन्हें लगा, ” यह लड़का तो पढ़ाई कर रहा है।  बाकी बच्चों की भाँती खेल नहीं रहा है।  इसे अपने विद्यालय में लाना मुश्किल है, फिर भी कोशिश करता हूँ। ”

 

 

 

 

ऐसा सोचकर वे उसके घर आये। वहाँ उस बच्चे के दादाजी बैठे हुए थे। अध्यापक महाशय ने उन्हें नमस्कार किया और उनसे कहा, ” मेरा नाम विनय दीक्षित है।  मैं एक अध्यापक हूँ और मैंने पास में ही अपना विद्यालय खोला है।  मैं चाहता हूँ कि यह बालक भी मेरे यहां पढ़ने आये। ”

 

 

 

 

इसपर बच्चे के दादाजी ने कहा, ” यह तो बहुत ही अच्छी बात है। बच्चों में शिक्षा की अलख जगाकर आप बहुत ही नेक कार्य कर रहे हैं, परन्तु मैं इसे आपके विद्यालय में भेज नहीं सकता, क्योंकि यह दूसरे विद्यालय में पढ़ता है और पढ़ाई बीच में छोड़कर आना उचित नहीं होगा । ”

 

 

 

 

इसपर अध्यापक विनय दीक्षित ने कहा, ” अभी समय ही कितना हुआ है।  नयी क्लास शुरू हुए अभी एक महीना ही तो बीता है।  मैं इसका कोर्स पूरा करवा दूंगा और मेरे विद्यालय में वहाँ से अधिक सुविधा मिलेगी। ”

 

 

 

बस यही बात बच्चे के दादाजी को खटक गयी।  उन्होंने कहा, ” मुझे तो लगा आप अध्यापक हैं, परन्तु आप तो बिजनेसमैन निकले।  यह ठीक है कि आपने विद्यालय खोला है और उसे अच्छे से चलाना आपकी जिम्मेदारी है, परन्तु इसके लिए आप किसी बच्चे का भविष्य कैसे बिगाड़ सकते हैं ? आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं ? आप लोगों ने शिक्षा को व्यापार बना दिया है।  आप जैसे लोगों के वजह से ही बच्चों को विद्यालय में पढ़ाना दिन-प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है। ”

 

 

 

 

अब अध्यापक विनय जी को लग गया कि यहां दाल नहीं गलने वाली है, लेकिन फिर भी उन्होंने तुक्का मारा और बच्चे को बुलाकर पूछा, ” आपका नाम क्या है ? ”

 

 

 

” सर, अमित पाठक ” बच्चे ने उत्तर दिया।

 

 

 

उसके बाद विनय दीक्षित ने उससे कई सारे प्रश्न पूछे।  कई प्रश्न तो ऐसे भी थे जो उसके क्लास के भी नहीं थे।  अमित ने सभी प्रश्नों का उत्तर बखूबी दे दिया।

 

 

 

 

अध्यापक महाशय चुप हो गए।  तब अमित ने उनसे कहा, ” मैंने आपके प्रत्येक प्रश्न के उत्तर दे दिए।  क्या आप मेरे प्रश्न का उत्तर देंगे ? ”

 

 

 

 

पहले तो अध्यापक महाशय सकपकाए, लेकिन फिर उन्होंने कहा, ” ठीक है, पूछो क्या पूछना है ? ”

 

 

 

अमित ने प्रश्न किया, ” सर शिक्षा व्यवसाय क्यों बन गयी है ? क्यों आप हम जैसे छात्रों से कठिन से कठिन प्रश्न पूछकर, जो कि मेरे क्लास से संबंधित भी नहीं थे, हमारा मनोबल गिराना चाहते हैं ? क्यों गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पा रही है ? ”

 

 

 

विनय दीक्षित निरुत्तर हो गए और चुपचाप वहाँ से चले गए। परन्तु इसका उत्तर तो समाज को ही ढूढना होगा, सरकारों को ढूढना होगा, प्रशासन को ढूढना होगा और निश्चित तौर पर विनय दीक्षित जैसे अध्यापकों को भी ढूढना होगा।

 

 

 

अध्यापक बच्चों को सच्ची राह दिखाते हैं।  उन्हें अर्जुन बनाते हैं, परन्तु अर्जुन को अर्जुन बनाने के लिए एकलव्य से अंगूठा मांगना गलत है। समाज में हर कोई ना तो पूर्ण सही होता है और ना ही पूर्ण गलत।

 

 

 

सबकों अपनी कमियां पहचाननी होंगी।  अध्यापक को भी, छात्रों को भी, अभिभावक को भी, सरकारों को भी।  पढ़ेगा इण्डिया….तभी तो बढ़ेगा इण्डिया। 

 

 

 

 

Moral – शिक्षा आवश्यक है, परन्तु शिक्षा का बाजारीकरण गलत है।  इससे शिक्षा का मूल्य समाप्त होता जा रहा है। 

 

 

 

 

Note – इस कहानी के सभी नाम काल्पनिक हैं और इसका उद्देश्य किसी की भावना को ढेंस पहुंचाना नहीं है, बल्कि समाज को शिक्षा के प्रति सचेत करना है।  यह सच्ची Freedom Of Speech है।  अगर किसी की भावना आहत हुई तो हम क्षमाप्रार्थी हैं। 

 

 

 

 

 

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