Top 5 + Moral Kahaniya in Hindi Written /  जीवन को शिक्षा देने वाली कहानियां

Top 5 + Moral Kahaniya in Hindi Written / जीवन को शिक्षा देने वाली कहानियां

इस पोस्ट में आपको Moral Kahaniya in Hindi Moral दी गयी है। मुझे उम्मीद है कि सभी  Kahaniya in Hindi आपको जरूर पसंद आएँगी। 

 

 

 

 

माँ तुलसी और शालिग्राम की कथा (  Moral Kahaniya in Hindi To Read )

 

 

 

 

इंद्र के किसी दुःसाहस को लेकर महादेव क्रोधित हो गए थे और उनके नेत्रों से क्रोधाग्नि निकल पड़ी।  महादेव के क्रोधाग्नि को अपने समीप आते देख इंद्र ने अपने प्राण बचाने के लिए पलायन करते हुए ब्रह्मा जी के पास गए। लेकिन ब्रह्मा जी ने इंद्र को अपने यहाँ आश्रय देने से मना कर दिया।

 

 

 

 

 

फिर इंद्र ने विष्णु लोक जाना उचित समझा और विष्णु  जी के यहाँ उपस्थित हुए। विष्णु जी भी महादेव की क्रोध को रोकने में असमर्थता व्यक्त की जिस कारण इंद्र को वहां से भी पलायन करना पड़ा।

 

 

 

जालंधर की कथा 

 

 

 

रास्ते में जाते समय उन्हें देव ऋषि मिले।  उनसे इंद्र की दुर्दशा देखी नहीं गई। देव ऋषि ने इंद्र से कहा, ” इस क्रोध से तुम्हे स्वयं महादेव ही बचा सकते है, अतः तुम उन्ही के पास जाओ। “

 

 

 

 

 

इंद्र फिर महादेव के यहाँ गए और उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे। तब महादेव ने अपने क्रोध की ज्वाला को अपनी शक्ति के द्वारा सागर में प्रविष्ट कर दिया। परिणाम स्वरूप सागर में ही जालंधर असुर का जन्म हुआ, जो देवताओं के लिए बहुत भयंकर साबित हुआ। जालंधर के पत्नी का नाम वृंदा था वह विष्णु जी की परम भक्त थी।

 

 

 

 

 

उसे विष्णु जी से वरदान प्राप्त था कि  जब तक उसका ध्यान अपने पति के ऊपर लगा रहेगा तब तक उसे कोई नहीं मार सकता, यहाँ तक कि तीनों त्रिदेव भी नहीं।

 

 

 

 

इस वरदान के द्वारा ही वह देवताओं को असीम त्रास देने लगा और इंद्र के सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया। उसकी मृत्यु महादेव के हाथों होनी थी, लेकिन विष्णु के वरदान के कारण वह अजेय बना हुआ था। इसी कारण सभी देवता उससे भयभीत रहते थे।

 

 

 

 

 

सभी देवताओ को परास्त करने के बाद उसने महादेव को भी युद्ध के लिए ललकारा। जालंधर को महादेव से लड़ते देख विष्णु जी को एक युक्ति सूझी।

 

 

 

 

 

उसी समय विष्णु जी जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास आए। अपने पति को युद्ध स्थल से आया देखकर वृंदा अपने पति स्वागत करने के प्रस्तुत हुई।

 

 

 

 

 

लेकिन  वृंदा को कुछ शक हुआ तो उसने विष्णु जी प्रश्न किया, ”  आप कौन है ?  विष्णु जी ने कहा, ”  मैं तुम्हारा पति जालंधर हूं। ” इसपर वृंदा ने कहा, ” तो आप इस समय रणभूमि से वापस क्यों आ गए ?

 

 

 

 

इस पर विष्णु जी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए।  संतोषजनक उत्तर न पाकर वृंदा ने विष्णु जी को श्राप दे दिया, ” जाओ तुम पत्थर बन जाओगे। ”

 

 

 

 

यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आया और उन्होंने  भी वृंदा को भी श्राप दिया, ” तुम वृक्ष बन जाओगी। ”

 

 

 

 

वृंदा ने विष्णु जी से पूछा, ”  मैं कौन सा वृक्ष बनू ?  एक वृक्ष वह होता है, जो किसी के भी काम में नही आता है। ” इस पर विष्णु जी ने कहा, ”  पहले तुम बताओ कि मैं कौन पत्थर बनूंगा ?  एक पत्थर वह होता है जिसके ऊपर लोग कपडे धोते हैं । ”

 

 

 

 

 

इस पर वृंदा ने कहा, ” आप वह पत्थर बनोगे जिसकी संसार में पूजा होगी और वह पत्थर  शालिग्राम के नाम से विख्यात होगा। ” फिर विष्णु जी ने कहा, ” तुम वह वृक्ष बनोगी जिसके बिना हमारी पूजा अपूर्ण रहेगी। वह वृक्ष है तुलसी और जहा भी हमारी पूजा होगी वहां तुम्हारा होना अनिवार्य रहेगा। ” इसी वार्तालाप में वृंदा का अपने पति के ऊपर से ध्यान भंग हो गया परिणाम स्वरूप महादेव ने जालंधर का वध कर दिया।

 

 

 

 

किसी को तुच्छ नहीं समझना चाहिए ( Kahaniya in Hindi New )

 

 

 

 

Kahaniya in Hindi

 

 

 

2- मित्रों कभी किसी को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए।  हर कोई एक समान होता है।  कहीं पर किसी की आवश्यकता होती है तो कहीं पर किसी की।  आज की यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी इसी पर आधारित है।

 

 

 

एक बगीचे में तरह तरह के फूल और वृक्षों की भरमार थी। गुड़हल का पेड़ अपने लाल लाल फूलों की वजह से बहुत ही खूबसूरत लग रहा था, हर कोई उसकी प्रसंसा कर रहा था।

 

 

 

जबकि उसके तने और टहनियों पर कोई ध्यान ही नहीं देता था।  अब आप ही सोचो अगर नींव ही न रहे तो इमारत खड़ी हो ही नहीं सकती। यही हाल गुड़हल के पत्तों और टहनियों का था, जो अपनी प्रशंसा सुनने के लिए हमेशा उत्सुक रहते थे।

 

 

 

 

जिस तरह पतंगा दिए की लौ पर आकर्षित होता है उसे दिए से कोई प्रयोजन नहीं होता उसी तरह यह मानव का स्वभाव है। फलतः जड़ की तरफ कोई जाना ही नहीं चाहता जबकि हकीकत यह है कि जड़ के बिना डाली और पत्तों के बिना फूल का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

 

 

 

 

एक बार जोर की आंधी आई।  एक टहनी पत्ते के साथ टूटकर तालाब में गिर गया और उसी तालाब में चींटियों का समूह जा रहा था, उन लोगो को लगा कि अब हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

 

 

 

 

लेकिन टहनियों और पत्तों ने उन चींटियों को सहारा देकर उनकी जान बचाई। चींटियों ने उनका धन्यवाद किया, यह सुनकर टहनियों और पत्तो को आत्मगौरव की अनुभूति हुई।

 

 

 

 

Moral – किसी को तुच्छ नहीं समझना चाहिए।

 

 

Moral Of The Story – No one should be despised.

 

 

 

 

 

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कर्म करो फल की चिंता मत करो ( Moral Kahaniya in Hindi ) 

 

 

 

Kahaniya in Hindi

 

 

3- मित्रों हमें कर्म करना चाहिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, परन्तु यह ध्यान रखें कि कर्म अच्छे हों तभी अच्छा फल मिलने की उम्मीद रहती है। अगर आप बबूल लगाएंगे और सोचेंगे इसमें आम के फल लगेंगे तो यह संभव नहीं है।  आज की यह हिंदी कहानी इसी पर आधारित है।

 

 

 

विनय ने रामू काका को घर बनवाते देखा तो उसने रामू काका से पूछा, “आप यह घर इतने अच्छे तरीके से बनवा रहे है क्या आप इसमें सदैव ही रहेंगे ? ”

 

 

 

 

यह बात सुनकर रामू काका ने विनय से पूछा, “अच्छा यह बताओ कि क्या तुम्हारा घर तुम्हारे पिता ने बनवाया था ?  ” विनय ने कहा, ” नहीं काका। मुझे पिता जी से ज्ञात हुआ कि हमारा घर दादाजी के द्वारा बनवाया गया है। “

 

 

 

 

 

फिर रामू काका ने विनय से कहा, ” अगर तुम्हारे दादाजी ने यह सोचा होता कि इस घर में सदैव तो रहना नहीं है तो उन्होंने उस घर को नहीं बनवाया होता। परिणाम स्वरूप उस घर का सुख तुम्हे और तुम्हारे पिता को नहीं मिलता। उन्होंने अपने कर्म को किया बिना फल की इच्छा से जिसका फल तुम लोगो को मिल रहा है। ”

 

 

 

 

Moral – कर्म करो, फल की चिंता मत करो। 

 

 

Moral Of The Story – Work, don’t worry about the fruit.

 

 

 

Hindi Moral Kahaniya

 

 

 

4- एक राजा था।  उसके गुरु ने उसे दो बातें बताई थी। पहली बात, ” जो आया है वह जाएगा ” और दूसरी बात, ” कभी किसी बात की अति मत करो। “

 

 

 

राजा को शिकार खेलने की आदत थी। जब तक वह काफी ज्यादा शिकार नहीं कर लेता उसे संतोष नहीं होता था।एक दिन उसने अपने गुरु की बात को आजमाने का निश्चय किया और वह जंगल में आखेट के लिए निकला।

 

 

 

 

जैसे ही राजा ने दो हिरण का शिकार किया उसी समय उसे एहसास हुआ कि उसके पीछे कोई आ रहा है। उसने पीछे मुड़कर देखा तो एक हाथी दौड़ते हुए उसी की तरफ आ रहा है।

 

 

 

 

राजा ने अपने घोड़े को जोर से दौड़ाया। कुछ दूर जाने के बाद उसे एक बड़ी सी चट्टान दिखाई  दी। वह अपनी जान बचाने के लिए घोड़े के साथ उसके पीछे जाकर छिप गया।

 

 

 

 

हाथी पेड़ पौधों को नष्ट करता हुआ उस पत्थर के समीप से गुजर गया और राजा की जान बच गई। लेकिन राजा का जन्मजात गुण शिकार करना होता है और जब तक वह  शिकार नहीं कर लेता उसे संतोष नहीं होता है।

 

 

 

 

उसने अपने गुरु सीख की परीक्षा लेनी चाही, उसने कुछ  शिकार किया और अपने राज्य में आ गया। राजा को जल्दी आया देख सब लोग चकित थे। कुछ क्षण के उपरांत बहुत भयंकर तूफान आया। तभी राजा ने सोचा कि अगर आज मैं ज्यादा शिकार के चक्कर में पड़ता तो मेरा बचना मुश्किल  था।

 

 

 

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दरकते रिश्ते ( 5 Kahaniya in Hindi Moral Stories )

 

 

 

Kahaniya in Hindi

 

 

 

 

5- ज़माना कितना बदल चुका है।  जीवन की आपा – धापी में लोग रिश्तों के महत्व को भूलते जा रहे हैं। अब तो त्योहारों पर भी रिश्ते निभाना मात्र एक परम्परा का हिस्सा रह गया है।

 

 

 

लोग पैसे के पीछे इतने पागल हो चुके हैं कि अब सारे रिश्ते – नाते बेमानी हो गए हैं।  यह कहानी इसी दरकते रिश्तों पर आधारित है।  पुराने समय की बात है।

 

 

 

उस समय मोबाइल नहीं हुआ करता था।  चिठ्ठियों के घर आते ही खुशहाली दौड़ जाती थी।  विजय बहादुर एक किसान थे।  उनके दो पुत्र थे विनय और विक्रम।

 

 

 

उन्होंने दोनों का एक ही राशि पर रखा था, जिससे दोनों का व्यवहार एक रहे, राशि का प्रभाव दोनों पर एक जैसा हो, परन्तु यह सब तो कर्म पर आधारित होता है और कर्म सबके अलग ही होते हैं।

 

 

 

बड़ा बेटा विनय गरीबी और घर की मजबूरी के कारण पढ़ – लिख नहीं पाया।  वह अपने पिता के साथ खेती करता था, जबकि छोटा बेटा १० वीं पास करने के बाद मास्टरी की तैयारी कर रहा था।

 

 

 

उस जमाने में आठवीं पास करना बहुत बड़ी बात थी। ऐसे में उसे अपनी पढ़ाई पर बहुत नाज था।  वह खेती के काम में थोड़ा भी हाथ नहीं बटाता था, इसलिए विजय बहादुर अपने बड़े बेटे को ज्यादा मानते थे।

 

 

 

समय बीता और दोनों बेटों का विवाह हो गया और विवाह के बाद विक्रम की मास्टरी की नौकरी भी लग गयी और इसी के साथ ही दोनों भाइयों में अनबन भी शुरू हो गयी।

 

 

 

 

कुछ वर्षों तक ऐसा ही चलता रहा।  इन सबसे विजय बहादुर और उनकी पत्नी बहुत ही दुखी और चिंतित रहने लगे।  कहा जाता है चिंता चिता से भी खतरनाक होती है और आखिरकार चिंता में डूबे पति – पत्नी की जल्द ही चिता सज गयी।

 

 

 

माता – पिता की मृत्यु के पश्चात दोनों भाइयों में अनबन और अधिक बढ़ गयी और अंततः दोनों भाइयों के चूल्हे अलग हो गए।  हालांकि अभी घर और खेती का बटवारा अभी नहीं हुआ था।

 

 

 

 

विक्रम को अपने भाई विनय से कम परन्तु पिता विजय बहादुर से अधिक चिढ थी कि उन्होंने सारा कुछ विनय को ही दे दिया, मुझे कुछ नहीं दिया और यही चिढ दोनों भाइयों के बीच में दरार का कारण बन गयी।

 

 

 

 

इसमें समाज के कुछ कथित बुद्धिजीवियों ने आग में घी का काम किया और इसका परिणाम यह हुआ कि दोनों भाइयों में बोली – चाली भी बंद हो गयी।

 

 

 

 

लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।  विनय का एक लड़का था विशाल और विक्रम को दो लड़का शनि और रवि तथा एक लड़की विद्या थी।

 

 

 

विशाल और शनि की खूब जमती थी। दोनों भाइयों की दुश्मनी भी इनके प्यार को डिगा नहीं सकी और अंत में दोनों परिवार फिर से एक हो गए।

 

 

 

लेकिन अब वह प्रेम नहीं रह गया था।  रिश्तों में दरार आ गयी थी। यह एकजुटता नहीं बल्कि समझौता था।  कुछ दिन गुजरे और विशाल और शनि शहर में जाकर नौकरी करने लगे और वही रहने लगे।

 

 

 

 

अब चूंकि विशाल शहर में रहने लगा था तो विनय ने भी वही रहने के बारे में सोचा। इसपर विनय  अपनी पूरी जमीन – जायदाद बेचना चाह रहा था और विक्रम सोच रहा था कि भैया अपनी जमीन – जायदाद उसे ही दे दें।

 

 

 

लेकिन पुराने झगड़े के कारण और पत्नी के विरोध के कारण विनय ने पूरी जमीन – जायदाद दूसरे को बेच दी और इसी के साथ ही दोनों के बीच दूरियां और भी बढ़ गयीं।

 

 

 

 

कहा जाता है कि अच्छाई  तो लोग भूल जाते हैं और बुराई हमेशा याद रहती है।  विनय की इस एक गलती ने फिर से दोनों परिवारों को बिछड़ने पर मजबूर कर दिया और रही सही कसर शहर और गाँव के बीच की दूरी ने पूरी कर दी, क्योंकि विनय के शहर में बस जाने के कारण अब आना जाना भी नहीं रहा और जमीन बेचने की खुन्नस विक्रम के दिल में घर कर गयी और अतंतः दोनों परिवारों के बीच फिर से वितराग हो गया जो फिर कभी नहीं जुड़ सका।

 

 

 

रहीम जी ने सत्य ही लिखा है…..रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।

 

टूटे फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए।

 

 

 

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