5+Stories in Hindi To Read / जीने की चाह हिंदी कहानी जरूर पढ़ें

Stories in Hindi इसमें Stories in Hindi With Moral  की कहानियां दी गयी है।  सभी शिक्षाप्रद हिंदी कहानी है।  एक सार्वजनिक संस्था के सदस्य गांधी जी से चर्चा के लिए उनके पास पहुंचे।  उस समय गांधीजी वर्धा में थे।

 

 

 

गांधीजी को बातचीत के दौरान लगा कि इस कार्य के लिए दो – तीन लोगों की आवश्यकता नहीं है। गांधीजी ने उनसे कहा, ” आप सभी को इस काम के लिए रुकना उचित नहीं है।  आपमें से कोई दो वापस लौट जाए।

 

 

 

 

समय का महत्व ( Stories in Hindi For Kids )

 

 

 

 

 

वे लोग एक – दूसरे का मुँह देखने लगे। तब गांधीजी ने उन्हें समझाते हुए कहा, ” सदैव समय का उपयोग करना चाहिए।  समय का अपव्यय करना अनुचित है। जिस समय यहां एक व्यक्ति काम कर रहा होगा उस समय दूसरा वहाँ जाकर कोई और काम कर सकता है। ”

 

 

 

समय के महत्व को समझ कर वे लोग अपनी गलती समझ गए और एक को छोड़कर बाकी वापस लौट गए।

 

 

 

Moral – इस बात से हमें यही शिक्षा मिलती है कि जो समय का उचित उपयोग करते हैं वे सदैव ही जीवन में सफल होते हैं। 

 

 

 

 

कर्तव्यनिष्ठा हिंदी कहानी ( Stories in Hindi Language ) 

 

 

 

 

 

 

 

 

2- संधि का प्रस्ताव असफल होने पर जब श्रीकृष्ण हस्तिनापुर की तरफ लौटे तब महारथी कर्ण  उन्हें विदा करने आये।  मार्ग में  महारथी  कर्ण को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने कहा , ”  कर्ण, तुम सूतपुत्र नहीं हो। तुम तो महाराजा पांडु और देवी कुंती के सबसे बड़े पुत्र हो। यदि दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों के पक्ष में आ जाओं तो तत्काल तम्हारा राज्याभिषेक कर दिया जाएगा। तुमको भी पता है कि कौरव गलत रास्ते पर हैं।  उनका विनाश सुनिश्चित है। इसलिये पाप को छोड़कर पुण्य की तरफ आ जाओ।  ”

 

 

 

 

 

यह सुनकर महारथी कर्ण ने कहा, ” हे वासुदेव, मैं जानता हूँ कि मैं माता कुन्ती का पुत्र हूँ और मुझे यह भी पता है कि कौरव गलत रास्ते पर हैं और उनका विनाश निश्चित है।  लेकिन प्रभु यह बताईये जब सभी सूतपुत्र कहकर मेरा तिरस्कार कर रहे थे तब केवल दुर्योधन ने ही मुझे सम्मान दिया। क्या मैं उसे भूल जाऊं ? मेरे भरोसे दुर्योधन ने पांडवों को युद्ध की चुनौती दी है तो क्या मैं उसके विश्वास को तोड़ दूँ ? मैं जानता हूँ प्रभु कि  युद्ध में विजय पांडवों की होगी, लेकिन आप मुझे अपने कर्त्तव्य से क्यों विमुख करना चाहते हैं?’

 

 

 

कर्त्तव्य के प्रति कर्ण की निष्ठा से भगवान श्रीकृष्ण निरुत्तर हो गए।

 

 

 

Moral- इस प्रसंग से यह बात साबित होती है कि कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा व्यक्ति के चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है और उस दृढ़ता को बड़े-से-बड़ा प्रलोभन भी शिथील नहीं कर पाता।

 

 

 

 

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3- एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे।  तभी उनका एक शिष्य अचानक से खड़ा हुआ और बोला, ” आप उपदेश क्यों देते हैं ? उपदेश देने के पीछे आपका क्या मकसद होता है ? ”

 

 

 

गौतम बुद्ध अपने शिष्य के सभी सवाल को बड़े ही ध्यान से सुन रहे थे।  उसके सवाल ख़त्म होने के बाद वे बोले, ” मैं इसलिए उपदेश देता हूँ ताकि लोगों को सही राह दिखा सकूं।  लोगों को सहीं और गलत के बीच फर्क बता सकूं।  मेरे उपदेश सुनने के बाद कई लोगों को शान्ति मिलती है।  वे अपने जीवन में उचित निर्णय ले पाते हैं। ”

 

 

 

 

इसपर शिष्य ने फिर कहा, ” लेकिन ऐसा क्यों होता है कि आपके उपदेश सुनने आने वालों में से कुछ लोग ही क्यों सही राह पर जाते हैं और कुछ लोगों को ही क्यों शान्ति मिलती है ? हर कोई उचित राह पर क्यों नहीं जाता है ? ”

 

 

 

 

शिष्य की बात सुनने के बाद गौतम बुद्ध ने कहा, ” एक बात बताओ, यदि आप किसी जंगल से कहीं जा रहे हो और तुम्हे एक व्यक्ति मिल जाए जो आपसे राजमहल का रास्ता पूछे तो आप क्या करेंगे ? ”

 

 

 

शिष्य ने तपाक से जवाब दिया, ” उसे सही रास्ता बता दूंगा जिससे वह अपनी मंजिल पर पहुँच जाए। ”

 

 

 

इसके बाद गौतम बुद्ध ने कहा, ” अगर  आपके सही रास्ता बताने पर व्यक्ति गलत रास्ता चुन ले तो ? ”

 

 

 

इसपर शिष्य ने कहा, ” मेरा काम उसे रास्ता बताना है। उस रास्ते पर चलना या ना चलना यह उसके ऊपर निर्भर करता है।  मैंने तो उसे सही रास्ता बताया और फिर भी उसने गलत रास्ते का चुनाव किया तो उसमें मैं क्या कर सकता हूँ। ”

 

 

 

इसपर गौतम बुद्ध ने हँसते हुए कहा, ” आपके सवालों का आपने ही जवाब दे दिया है।  मैं सिर्फ मार्गदर्शन कर सकता हूँ।  उस रास्ते पर चलना या ना चलना लोगों का अधिकार है।  उसमें मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ। ”

 

 

 

जो लोग मेरे बताये हुए मार्ग का अनुसरण करते हैं वे जीवन में सफल होते हैं और जो लोग उसका अनुसरण नहीं करते और गलत राह पर चलते हैं उसमें  मेरा कोई दोष नहीं है। निर्णय लेने के लिए लोग स्वतंत्र हैं।

 

 

 

गौतम बुद्ध की बात सुनकर शिष्य को समझ में आ जाता है कि गौतम बुद्ध उपदेश देकर लोगों को उचित राह दिखाते हैं।  उस राह पर चलना या नहीं चलना यह लोगों के हाथ में होता है।

 

 

 

 

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दृढ़ निश्चय हिंदी कहानी 

 

 

 

4-  आज महर्षि दयानन्द सरस्वती जी से जुड़ा एक अनोखा किस्सा बताने जा रहा हूँ जिसे पढ़कर आप सोचने को मजबूर हो जाएंगे।  स्वामी विरजानन्द जिन्हे लोग दंडी  स्वामी भी कहते थे।  उनके पाठशाला में शिष्य आते, कुछ समय तक रहते परन्तु उनकी प्रताड़ना को सह नहीं पाते और भाग जाते थे।

 

 

 

 

बहुत ही कम शिष्य ऐसे निकलते जो पूरी शिक्षा ग्रहण कर पाते।  यह दंडी स्वामी की बहुत बड़ी कमजोरी थी। स्वामी दयानन्द सरस्वती को भी कई बार उनसे दंड मिला, लेकिन वे दृढ निश्चयी थे।  इसलिए वे डटे रहे।

 

 

 

 

एक दिन दंडी स्वामी को क्रोध आया और उन्होंने दयानंद  की की खूब पिटाई की और बहुत फटकार लगाईं। उन्हें बहुत भला – बुरा कहा। दयानन्द के हाथ में चोट लग गयी  और काफी दर्द होने के बाद भी दयानंद ने बुरा नहीं माना बल्कि उठकर गुरूजी के हाथ को अपने हाथ में ले लिया और उसे सहलाते हुए बोले, ” आपके कोमल हाथों को बहुत कष्ट हुआ।  इसका मुझे खेद है।  मुझे क्षमा कर दें।  ”

 

 

 

दंडी स्वामी ने दयानन्द का हाथ झटकते हुए कहा, ” पहले तो गलती करते हो और फिर चमचागिरी।  यह मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है। ”

 

 

 

पाठशाला के सभी विद्यार्थियों ने यह दृश्य देखा।  उनके नयनसुख नाम का छात्र था।  वह दंडी स्वामी का सबसे चाहता विद्यार्थी था। नयनसुख को दयानंद पर सहानुभूति आयी।

 

 

 

वह उठकर गुरूजी के पास गया और बड़े ही संयम से बोला, ” गुरूजी! यह तो आप भी जानते हैं कि दयानंद मेधावी छात्र है, परिश्रम भी बहुत करता है।’ कभी – कभी गलती हो जाती है।  उसे माफ़ कर दें। ”

 

 

 

दंडी स्वामी को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।  उन्होंने दयानंद को अपने करीब बुलाया और उनके कंधे पर हाथ रखकर बोले, ” भविष्य में  हम तुम्हारा पूरा ध्यान रखेंगे और तुम्हें पूरा सम्मान देंगे। ”

 

 

 

जैसे ही छुट्टी हुई, दयानंद नयनसुख के पास पहुंचे और उससे कहा, ” मेरी सिफारिश करके तुमने अच्‍छा नहीं किया। गुरुजी तो हमारे हितैषी हैं। दंड देते हैं तो हमारी भलाई के लिए ही। हम कहीं बिगड़ न जाएं, उनको यही चिंता रहती है।’

 

 

 

 

यही दयानंद आगे चलकर महर्षि दयानंद बने और वैदिक धर्म की स्थापना हेतु ” आर्य समाज ” की स्थापना की और महर्षि दयानंद सरस्वती के नाम से विश्वविख्यात हुए।

 

 

 

 

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जीने की राह ( Stories in Hindi Pdf )

 

 

 

 

 

 

 

 

 

5– यह एक सच्ची कहानी है।  यह  हैरतअंगेज कहानी अंडमान और निकोबार के शहीद द्वीप के रहने वाले विक्रम ( नाम बदला हुआ ) की है। वे दरअसल समुद्र में रोजाना आने-जाने वाले जहाजों को रोजमर्रा की चीजों जैसे राशन और पानी के पानी आदि को पहुंचाने का काम करते हैं। यही उनकी जीविका भी है।

 

 

 

इसी काम के तहत वे २८ सितम्बर को अपने दोस्त विशाल ( नाम बदला हुआ ) के साथ निकले थे। उन्हें हिन्द महासागर से गुजरने वाली जहाज़ों को राशन और दूसरी रोजमर्रा की चीजे पहुंचानी थी।

 

 

 

उसी दौरान एक तूफ़ान में वे रास्ता भटक गए और उनकी नाव को भी काफी नुक्सान हुआ।  उन्हें अपनी नाव को हल्का करने के लिए कई चीजों को फेंकना पड़ा।

 

 

 

विक्रम  ने इस दौरान कई बड़ी जहाज़ों को इशारा देने की कोशिश की लेकिन किसी की भी नजर उनपर नहीं गयी। आख़िरकार बर्मा नेवी का जहाज उन्हें देखने में कामयाब हो गया।

 

 

 

उन्होंने विक्रम  की मदद की। उन्होंने उनके नाव को २६० लीटर ईंधन से भरा और अंडमान – निकोबार जाने के लिए एक कम्पास भी लगाया। लेकिन नसीब ने एक बार फिर से धोका दिया और वे फिर से एक तूफान में घिर गए और रास्ता भटक गए।

 

 

 

नाव का ईंधन भी ख़त्म हो गया। कुजूर ने जीने की उम्मीद नहीं छोड़ी।  उन्होंने समुद्र का पानी पीकर खुद को ज़िंदा रखा। वे तौलिये को समुद्र के पानी से भिगाते  थे और उसे निचोड़ने पर जो पानी निकलता उसे वे इस्तेमाल में लाते थे।

 

 

 

विक्रम  दोस्त विशाल की इस दौरान मृत्यु हो गयी। लगातार समुद्र के पानी पीने और भूख के कारण उनकी मृत्यु हो गयी। उन्होंने विशाल के शव को पानी में बहा दिया।

 

 

 

विक्रम बुरी तरह से टूट गए थे।  लेकिन उन्होंने हार नहीं  मानी और एक बार फिर से उन्हें भगवान् का सहारा मिला और एक जहाज ने उन्हें देखा और उसकी मदद से वे उड़ीसा पहुंचे और फिर उन्हें इलाज के बाद अंडमान भेजा गया। उन्हें उनकी ” जीने की चाह ” ही ज़िंदा रख सकी।

 

 

 

 

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